कोरोना वायरस जब दुनियाभर में फैलना शुरू हुआ था, तब कई देशों ने यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिए थे, ताकि वायरस का प्रसार न हो। अब इसी से संबंधित एक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि यात्रा प्रतिबंध लगाने का उन देशों में फायदा हुआ है जहां कोविड-19 के कम मामले सामने आए हैं या फिर उन देशों में भी यह फायदेमंद साबित हुआ है जिनके उच्च दर वाले कोरोना संक्रमण देशों के साथ यात्रा संपर्क मजबूत हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यात्रा प्रतिबंध ठोस अध्ययन पर आधारित होने चाहिए, तभी वह फायदेमंद साबित हो सकते हैं। 'द लांसेट पब्लिक हेल्थ' नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह जानकारी सामने आई।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
अध्ययन के अनुसार, महामारी फैलने के प्रारंभिक चरणों में यात्रा करने पर लगाए गए प्रतिबंध सबसे ज्यादा कारगर साबित हुए, लेकिन यह कदम तब उतने प्रभावी नहीं होंगे जब एक देश के भीतर संक्रमण तेजी से फैल रहा है।
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'लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन' के प्रोफेसर मार्क जिट ने कहा, 'हमें पता है कि इन कदमों से एक बड़ी आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ी है इसलिए सरकारों को चाहिए कि यात्रा पर प्रतिबंध किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लगाए जाएं।'
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जिट ने कहा, 'प्रतिबंध लगाने से पहले उन्हें स्थानीय स्तर पर संक्रमण के आंकड़े जुटाने चाहिए, महामारी की वृद्धि दर और उन देशों से आने वाले यात्रियों की संख्या पर विचार करना चाहिए जो संक्रमण से अधिक प्रभावित हैं।' अनुसंधानकर्ताओं ने विमान के आंकड़ों का इस्तेमाल कर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से आने वाले संक्रमित यात्रियों की संख्या की तुलना उस देश में फैल रहे संक्रमण के मामलों से की।
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चूंकि यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने से कोरोना के प्रसार को रोकने में तो मदद मिली है, लेकिन इससे वैश्विक स्तर पर विमानन कंपनियों को बहुत नुकसान हुआ है। विमानन कंपनियों के वैश्विक संगठन अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात संघ (आईएटीए) के एक शीर्ष अधिकारी ने हाल ही में कहा था कि 2020 में विमानन कंपनियों का नुकसान 118.5 अरब डॉलर और 2021 में 38.7 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। हाल ही में आईएटीए के सीईओ एलेक्जेंडर डि जुनियाक ने कहा था कि कोरोना के चलते रेवेन्यू पैसेंजर किलोमीटर (राजस्व यात्री किलोमीटर) अपनी 2019 की स्थिति में साल 2024 तक ही लौट सकेगा।