कोरोना वायरस को लेकर लगातार नए-नए शोध हो रहे हैं और कई ऐसे खुलासे भी हो रहे हैं जो चौंका देते हैं। चूंकि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ ये पहले ही कह चुके हैं कि सर्दियों में यह वायरस तेजी से संक्रमण फैला सकता है, अब इसी को लेकर एक नया शोध हुआ है। दरअसल, वैज्ञानिकों ने वायरस जैसे कणों का इस्तेमाल कर यह पता लगाया है कि सतह पर कोरोना वायरस के अस्तित्व पर पर्यावरण का क्या प्रभाव पड़ता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह पाया कि सर्दियों में तापमान गिरने पर वायरस लंबे समय तक संक्रमणकारी रह सकता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
यह अध्ययन 'बायोकेमिकल एंड बायोफिजिकल रिसर्च कम्युनिकेशन्स' नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक, वायरस जैसे कण (वीएलपी) कोरोना वायरस के बाहरी ढांचे जैसे होते हैं। अमेरिका के यूटा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक, वीएलपी उसी लिपिड और तीन प्रकार के प्रोटीन से बने खोखले कण होते हैं जैसा कोरोना वायरस में होता है, लेकिन उनमें जीनोम नहीं होता। इसलिए उनसे संक्रमण का खतरा नहीं होता।
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इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने वायरस जैसे कणों की जांच, कांच की सतह पर शुष्क और नमी वाले वातावरण में की है। शोधकर्ताओं ने कहा कि कोरोना वायरस सामान्य रूप से तब फैलता है जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है। उन्होंने कहा कि खांसने या छींकने से निकलने वाली बूंदें जल्दी ही सूख जाती हैं, इसलिए उनसे निकले सूखे और नमी वाले वायरस के कण संपर्क में आई किसी भी सतह पर बैठ जाते हैं।
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उन्नत माइक्रोस्कोपी तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने बदलते हुए वातावरण में वीएलपी में आए बदलाव को देखा। उन्होंने वीएलपी के नमूनों को विभिन्न तापमान पर दो स्थितियों में परखा। एक स्थिति में उन्हें तरल में डाला गया और दूसरे में शुष्क वातावरण में रखा गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सामान्य तापमान या ठंड के मौसम में यह कण ज्यादा समय तक संक्रमणकारी रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि सतह पर वीएलपी के अस्तित्व पर नमी का बहुत कम प्रभाव पड़ता है।
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कोरोना वायरस ठोस सतहों पर कई घंटे या कई दिनों तक कैसे जिंदा रह पाता है, इसको लेकर हाल ही में एक अध्ययन रिपोर्ट 'फिजिक्स ऑफ फ्लूइड्स' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इस अध्ययन में यह पाया गया था कि कोरोना वायरस पतली तरल परतों से चिपककर सतह पर लंबे समय जीवित बना रहता है। यह शोध आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने किया था। शोधकर्ताओं ने बताया था कि नैनोमीटर- तरल परत 'लंदन वान डेर वाल्स फोर्स' की वजह से सतह से चिपकती है और इसी कारक की वजह से कोरोना वायरस घंटों तक किसी सतह पर जिंदा रह पाता है।