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विशेषज्ञ से जानें: वैक्सीन की पहली डोज के बाद कोरोना होने पर तीन महीने के बाद ही दूसरी खुराक क्यों लेनी है?

Tue, 03 Aug 2021 03:02 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Tue, 03 Aug 2021 03:02 PM IST
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Coronavirus in India covid 19 vaccine latest update coronavirus question answer in hindi
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

देश में कोरोना संक्रमण के दैनिक मामलों में थोड़ी कमी आई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, बीते 24 घंटे में 30 हजार से अधिक नए मामले सामने आए हैं, जबकि इससे पहले रोजाना 40 हजार के करीब मामले देखने को मिल रहे थे। फिलहाल देश में कोरोना से स्वस्थ होने की दर 97.38 फीसदी है। इस बीच कोरोना को खत्म करने के लिए टीकाकरण अभियान भी तेजी से चल रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अब तक देश में 47 करोड़ से अधिक टीके लगाए जा चुके हैं। इसमें 37 करोड़ से अधिक लोगों को पहली डोज, जबकि 10 करोड़ से अधिक लोगों को टीके की दूसरी डोज लगाई गई है। बीते सोमवार को 53 लाख 67 हजार से अधिक टीके लगाए गए हैं। हालांकि अभी भी देश में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिनमें वैक्सीन को लेकर झिझक है या वैक्सीन के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। आइए विशेषज्ञ से जानते हैं वैक्सीन और कोरोना से जुड़े कुछ सवालों के जवाब... 

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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air

वैरिएंट क्या है और क्यों आता है? 

  • दिल्ली स्थित एम्स के डॉ. पीयूष रंजन कहते हैं, 'जब कभी कोई वायरस मल्टीप्लाई करता है, तो उसके जेनेटिक स्ट्रक्चर (आनुवंशिक संरचना) में बदलाव आता है। इसे ही वैरिएंट कहते हैं। वायरस बहुत तेज खुद को बदलता है। कई वायरस ऐसे होते हैं, जिनमें बदलाव एक साल के बाद आता है, जैसे इंफ्लूएंजा वायरस है। वैरिएंट कोई भी हो, अगर व्यक्ति पहले से संक्रमित हो गए हैं और एंटीबॉडी है या वैक्सीन लगाकर एंटीबॉडीज बन गई हैं, तो वैरिएंट से उनकी रक्षा होगी। लेकिन नियमों का पालन करना जरूरी है।' 
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कोरोना पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air

कोरोना वायरस के वैरिएंट का अल्फा, बीटा, गामा नाम कैसे दिया जाता है? 

  • डॉ. पीयूष रंजन कहते हैं, 'डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की एक टीम है, जो नए वैरिएंट का नाम रखती है। जब वायरस किसी भी देश में पहुंचता है तो अपने जेनेटिक स्ट्रक्चर (आनुवंशिक संरचना) में बदलाव लाता है। ऐसे में कुछ समय पहले तक जब किसी दूसरे देश के वैरिएंट से किसी देश में बहुत ज्यादा संक्रमण और डेथ रेट (मृत्यु दर) बढ़ता था, तो उस देश के नाम से वैरिएंट का नाम रखा जाता था, जैसे यूके वैरिएंट, ब्राजील वैरिएंट आदि। जब वहां के वैरिएंट किसी दूसरे देश में पहुंचते थे, तो हम कहते थे कि लंदन वैरिएंट से संक्रमण बढ़ गया है। इससे उस देश के प्रति लोगों में हीन भावना न आए, नकारात्मकता न आए, इसलिए अब हर वैरिएंट को अल्फा, डेल्टा या डेल्टा प्लस नाम दिया जाने लगा।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air

देश में अभी भी कई लोगों में वैक्सीन को लेकर हेजिटेशन है, क्या कहेंगे? 

  • डॉ. पीयूष रंजन कहते हैं, 'वैक्सीन को लेकर जो हेजिटेशन (झिझक) है, वो लाजमी है। कोई भी नई चीज को लेकर हम घबराते हैं कि कहीं वैक्सीन को लगाने से हमारे शरीर की कोई हानि न हो जाए। इसके लिए ही लोगों को जागरूक किया जाता है। लेकिन दुर्भाग्यवश कई जाने-माने लोगों के नाम पर वैक्सीन को लेकर इस तरह की अफवाह फैली और सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल होने लगी। एक अध्ययन में पाया गया कि करीब 30 प्रतिशत लोगों में वैक्सीन को लेकर जबरदस्त गलतफहमी है। जितनी तेजी से वायरस का संक्रमण फैल रहा है, उससे कहीं तेजी से वैक्सीन के खिलाफ गलत जानकारी फैल गई। लेकिन लोगों को तमाम माध्यमों से जागरूक किया गया कि कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन बहुत जरूरी है और पूरी तरह से सुरक्षित है। इसलिए परेशान न हों, देश में 45 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को वैक्सीन लग चुकी है और सभी सुरक्षित हैं।' 
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कोरोना वैक्सीन पर विशेषज्ञ की राय - फोटो : Twitter/Air

वैक्सीन की पहली डोज के बाद, संक्रमण होने पर तीन महीने के बाद ही दूसरी डोज क्यों लगवानी है? 

  • डॉ. पीयूष रंजन कहते हैं, 'जब हम दोनों डोज लेते हैं और एंटीबॉडीज बनती हैं, तो करीब छह महीने तक मानकर चलते हैं कि वो शरीर में असर करती हैं। अब अगर किसी को पहली डोज के बाद कोरोना का संक्रमण हो जाता है, तो शरीर खुद ब खुद एंटीबॉडी बनाने लगता है और व्यक्ति ठीक हो जाता है। संक्रमण होने के बाद शरीर में एंटीबॉडी करीब तीन महीने तक रहती है। ऐसे में पहली डोज और संक्रमित होने के बाद बनी एंटीबॉडीज, आने वाले तीन महीने तक व्यक्ति को प्रोटेक्ट (सुरक्षा) करेंगी। जब ये तीन महीने खत्म होंगे और दूसरी डोज लेंगे, तो आगे और तीन महीने यानी कुल नौ महीने तक व्यक्ति में एंटीबॉडी बनी रहेंगी।' 
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