अमेरिका की एक दवा बनाने वाली कंपनी ने कोविड रोगियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा रेमडेसिविर की आपूर्ति बढ़ाने के लिए भारत और पाकिस्तान की दवा कंपनियों के साथ समझौता किया है। अमेरिकी फार्मास्युटिकल कंपनी गिलीएड ने भारत और पाकिस्तान की पांच दवा कंपनियों के साथ समझौता किया है जिससे वो 127 देशों में इस दवा को उपलब्ध करा सकेंगी।
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गिलीएड की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अभी कंपनी ने जिन कंपनियों के साथ समझौता किया है उसके तहत इन पाँचों कंपनियों को गिलीएड से इस दवा को बनाने की टेक्नोलॉजी मिलेगी जिससे वो दवा का उत्पादन जल्दी कर सकेंगे। बयान के अनुसार इस लाइसेंस के लिए कंपनी तब तक रॉयल्टी नहीं लेगी जब तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविड-19 को लेकर घोषित आपातकाल को वापस नहीं हटा लेता, या इस बीमारी की कोई नई दवा या वैक्सीन को नहीं बना लिया जाता।
- भारत की जिन चार कंपनियों के साथ समझौता किया गया है वो हैं– सिप्ला लिमिटेड, हेटेरो लैब्स लिमिटेड, ज्यूबिलेंट लाइफसाइंसेज और माइलन।
- पाकिस्तान की कंपनी का नाम है– फिरोजसन्स लेबोरेट्रीज।
हैदराबाद स्थित निजी कंपनी हेटेरो लैब्स के महाप्रबंधक वाम्सी कृष्णा बांदी ने बीबीसी से कहा कि अभी ये कहना मुश्किल है कि दवा की कीमत क्या होगी और इसका उत्पादन कब शुरू होगा। उन्होंने कहा, ”स्थिति जून में और स्पष्ट होगी। हमारा अनुमान है कि इस दवा का सरकारी संस्थानों के जरिए नियंत्रित इस्तेमाल होगा। हमारा मुख्य उद्देश्य है कि भारत अगर इसका इस्तेमाल करता है तो वो इसे बनाने को लेकर आत्मनिर्भर हो जाए।“
एक अरब डॉलर के कारोबार वाली ये कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी एंटी-रेट्रोवायरल दवा बनाने वाली कंपनियों में आती है, जो एचआईवी-एड्स के 50 लाख रोगियों को दवा उपलब्ध कराती है। हेटेरो लैब्स दुनियाभर में अपने 36 कारखानों में लगभग 300 तरह की दवाएं बनाती है। फिलहाल भारत में वैज्ञानिकों और दवा नियंत्रकों को ये तय करना है कि वे इस दवा का इस्तेमाल कैसे करेंगे।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक रमन गंगाखेडकर ने कहा है कि वो इस दवा के इस्तेमाल के बारे में विचार करेंगे यदि भारतीय दवा कंपनियां इन्हें बना सकें। उन्होंने कहा, “प्रारंभिक आंकड़ों से ऐसा लगता है कि ये दवा कारगर है। हम डब्ल्यूएचओ के परीक्षणों के नतीजों की प्रतीक्षा करेंगे और ये भी देखेंगे कि क्या दूसरी कंपनियां भी इस पर काम कर सकती हैं।“
परीक्षण में उत्साहवर्धक परिणाम
अमरीकी संस्था नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीजेस (NIAID) ने इस दवा का क्लीनिकल ट्रायल किया था जिसमें दुनिया के कई देशों के हॉस्पिटलों में 1,063 लोगों पर परीक्षण किया गया और जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश शामिल हैं।
कुछ रोगियों को दवाएं दी गईं जबकि कुछ का प्लैसीबो या वैकल्पिक इलाज किया गया। NIAID के प्रमुख एंथनी फाउची ने कहा, रेमडेसिविर से स्पष्ट देखा गया कि इससे रोगियों में सुधार का समय घट गया है। उन्होंने कहा कि नतीजों से ये सिद्ध हो गया कि कोई दवा इस वायरस को रोक सकती है और इससे रोगियों के इलाज की संभावना का द्वार खुल गया।
मगर इस दवा से इस बात का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिल सका है कि इससे कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। जिन रोगियों को रेमडेसिवर दी गई उनमें मृत्यु दर 8 फीसदी पाई गई। वहीं जिन रोगियों का इलाज प्लेसिबो से किया गया उनमें मृत्यु दर 11.6 फीसदी थी।
कुछ सवाल
बीबीसी के स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता जेम्स गैलेघर का कहना है कि अभी ये साफ नहीं है कि इस दवा से किसे फायदा होगा और इससे कुछ सवाल भी पैदा होते हैं। क्या इससे ऐसे लोग और जल्दी ठीक हो जा रहे हैं ऐसे भी ठीक हो रहे थे?
- या क्या इससे लोगों को आईसीयू में पहुंचने की स्थिति से बचाया जा सकता है?
- ये दवा युवाओं में ज्यादा कारगर रही या बूढ़े लोगों में?
- या ऐसे लोगों में कारगर हुई जिन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी?
संवाददाता का कहना है कि ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो इस दवा का पूरा ब्यौरा सामने आने के बाद पूछे जाएंगे।