पूरी दुनिया की तरह भारत में भी कोरोना वायरस की वैक्सीन का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है। लेकिन, ये सवाल भी उठ रहा है कि दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माणकर्ता भारत इस मामले में कितना आगे है और कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन कब बना पाएगा। भारत बायोटेक इंटरनेशनरल कोवैक्सीन नाम से स्वदेशी कोरोना वैक्सीन विकसित कर रही है जिसके तीसरे चरण के परीक्षण (ट्रायल) में उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। अगली स्लाइड्स से जानिए, स्वदेशी वैक्सीन के विकास से जुड़ी अन्य बातें।
Covid-19 Vaccine: कब तक तैयार होगी भारत में कोरोना वैक्सीन, कितनी है प्रभावशाली, जानिए महत्वपूर्ण बातें
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प्रभावकारी परीक्षण वाली एकमात्र कंपनी है भारत बायोटेक
हैदराबाद में मौजूद डॉक्टर कृष्णा ईला ने फ़ोन पर बीबीसी से बात की। उन्होंने कहा, "भारत में क्लीनिकल ट्रायल एक बेहद मुश्किल काम है. मैं वॉलेंटियर्स को बधाई देता हूं क्योंकि प्रभावकारी परीक्षण करने वाली भारत में हमारी एकमात्र कंपनी है। इसमें समय लगेगा लेकिन हम वैश्विक मानदंडों का पालन कर रहे हैं।" हर वैक्सीन के लिए प्रभावकारी परीक्षण का मतलब है कि जिन लोगों के समूह को वैक्सीन दी गई है उनमें बीमारी में आई कमी का प्रतिशत।
बड़ी फार्मा कंपनियां कर रही हैं अलग-अलग देशों में एक साथ परीक्षण
विशेषज्ञों का दावा है कि आनुवंशिक और जातीय पृष्ठभूमि के आधार पर यह रेंज अलग-अलग हो सकती है। इसलिए बड़ी फार्मा कंपनियां अलग-अलग देशों में एक साथ परीक्षण करती हैं। इसलिए डॉक्टर रेड्डी की लैब रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी के लिए परीक्षण कर रही है और यूके स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी टीम ने पुणे में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ यहां परीक्षण करने के लिए करार किया है।
भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती सीमित परिवहन और कोल्ड स्टोरेज की है। लेकिन, डॉक्टर कृष्ण ईला मानते हैं कि उनकी टीम इस मामले में स्थानीय समाधान खोजने में एक कदम आगे है। वह कहते हैं, "हम इंजेक्शन जैसे मसले पर काम कर रहे हैं जो वाकई मुश्किल है. इसलिए हम एक वैकल्पिक रणनीति पर काम कर रहे हैं. क्या हम नाक से डालने वाली वैक्सीन बना सकते हैं जिसमें एक ही डोज़ देनी हो।
चीन और हॉन्ग-कॉन्ग में भी हो रहे प्रयोग
ऐसी खबरें हैं कि चीन भी नाक में डालने वाले स्प्रे की जैसी वैक्सीन पर प्रयोग कर रहा है. हॉन्ग-कॉन्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी इस पर काम कर रहे हैं। इससे स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण देने का बोझ भी बहुत कम हो जाएगा। ये आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दी जा सकती है जो इसे आसानी से लोगों तक पहुंचा सकते हैं।.