दुनियाभर में हर साल लाखों लोगों की मौत समय पर जरूरी अंग न मिलने या ट्रांसप्लांट न हो पाने के कारण हो जाती है। भारत की बात करें तो हर साल ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी अंगों की कमी के कारण करीब पांच लाख लोगों की जान चली जाती है। हर दिन कम से कम 15 लोगों की मौतों का एक बड़ा कारण अंगों की कमी है।
मेडिकल साइंस का कमाल: सुअर की किडनी ने 271 दिनों तक बचाए रखी इंसान की जान, दुनिया का पहला 'ब्रिज ट्रांसप्लांट'
अमेरिका में 66 वर्षीय किडनी फेलियर मरीज के शरीर में 69 जेनेटिक बदलाव वाली सुअर की किडनी लगाई गई। किडनी ने 271 दिनों तक काम किया और मरीज डायलिसिस से दूर रहा। बाद में उसे इंसानी डोनर की किडनी मिल गई। यह मामला भविष्य में किडनी की कमी दूर करने की नई उम्मीद जगाता है।
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पहले पूरा मामला जान लीजिए
अमेरिका में 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज की टाइप-2 डायबिटीज के कारण किडनी की बीमारी लास्ट स्टेज में पहुंच चुकी थी। उनके लिए तत्काल इंसानी किडनी मिलने की संभावना बेहद कम थी और डायलिसिस के साथ लंबा इंतजार करना भी जोखिम भरा था। फिर डॉक्टरों ने एक ऐसा फैसला लिया, जो कुछ साल पहले तक किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लगता।
- जनवरी 2025 में एंड्रयूज के शरीर में एक सुअर की किडनी ट्रांसप्लांट की गई। वैज्ञानिकों ने उस सुअर के आनुवंशिक ढांचे में 69 बदलाव किए, ताकि उसका अंग इंसानी शरीर के लिए अनुकूल बनाया जा सके और संक्रमण तथा अंग के रिजेक्ट होने का खतरा कम हो।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह किडनी करीब 271 दिनों तक काम करती रही और इस दौरान एंड्रयूज लगभग नौ महीने तक बिना डायलिसिस के स्वस्थ रहे। इस दौरान वह खाना बना सकते थे, घर की सफाई कर सकते थे। उनके लिए यह सिर्फ एक मेडिकल प्रयोग नहीं था, बल्कि लंबे समय बाद सामान्य जिंदगी में लौटने का मौका था।
बाद में लगाई गई इंसान की किडनी
हालांकि छह महीने बाद सुअर की किडनी की रक्त वाहिकाओं में कुछ डैमेज दिखना शुरू हुआ और कुछ समय बाद उसे शरीर से निकालना पड़ा। इसके बाद एंड्रयूज को स्वस्थ रखने के लिए डॉक्टरों को फिर से डायलिसिस का सहारा लेना पड़ा। इस बीच एक इंसानी डोनर की किडनी मिल गई, जो ट्रांसप्लांट होने के छह महीने बाद अब अच्छी तरह काम कर रही है।
मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि सुअर की किडनी को डॉक्टरों ने एक ब्रिज ट्रांसप्लांट यानी पुल की तरह इस्तेमाल किया। मसलन सुअर की किडनी ने जिंदगी को उस समय तक संभाले रखा, जब तक इंसानी किडनी उपलब्ध नहीं हो गई। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या आने वाले समय में किडनी ट्रांसप्लांट के लंबे इंतजार से परेशान मरीजों के लिए सुअर की किडनी अस्थायी सहारा बन सकती है?
एंड्रयूज इसे 'चमत्कार' बताते हैं। उनका कहना था कि इस ट्रांसप्लांट के बाद उन्हें ऐसा लगा जैसे फिर से नई जिंदगी मिल गई हो।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
गौरतलब है कि इंसानी डोनर अंगों की कमी ट्रांसप्लांट मेडिसिन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आखिरी-स्टेज की किडनी की बीमारी वाले मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट को डायलिसिस की तुलना में बेहतर इलाज माना जाता है, लेकिन जरूरत के मुकाबले इंसानी किडनी उपलब्ध नहीं हैं।
मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के सेंटर फॉर ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज और नेफ्रोलॉजी विभाग के डॉ. लियोनार्डो रिएला कहते हैं-
समय पर अंगों की कमी ट्रांसप्लांट के क्षेत्र का सबसे बड़ा संकट है। जेनोट्रांसप्लांटेशन (एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति के शरीर में ट्रांसप्लांट करना) इस कमी को दूर करने में मदद कर सकता है। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ऐसे मरीजों के लिए 'ब्रिज' के रूप में किया जा सकता है, जिन्हें इंसानी किडनी मिलने तक डायलिसिस से दूर रखना जरूरी है।
भविष्य में, अगर वैज्ञानिक यह साबित कर पाते हैं कि ऐसी किडनियां लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से काम कर सकती हैं, तो संभव है कि सुअर की किडनी खुद एक स्थायी भी बन सके।
इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट हुआ सुअर का लिवर-किडनी
इससे पहले अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ सुअर का लिवर-किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था।
चीन के शोधकर्ताओं और डॉक्टर्स की टीम ने दुनिया का पहला मल्टी-ऑर्गन पिग-टू-ह्यूमन ट्रांसप्लांट किया था। शोध के तौर पर ये अंग 53 वर्षीय व्यक्ति को लगाए गए थे जो पहले से ही ब्रेन-डेड था। जेनेटिक तौर पर तैयार ट्रांसप्लांट किए गए सुअर के दोनों अंगों ने लगभग पांच दिनों तक बेहतर तरीके से काम किया था। पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
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स्रोत:
Porcine kidney xenotransplantation as a bridge to allotransplantation: a first-in-human study
First pig liver and kidneys transplanted into a person — could ease organ shortages
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