सोचिए...सोमवार का दिन है, आप ऑफिस पहुंचने में लेट हो रहे हैं, मेट्रो स्टेशन पर पैर रखने की जगह नहीं है, और तभी काफी इंतजार के बाद एक मेट्रो आती है...। दरवाजे खुलते ही आप ट्रेन में दाखिल हो जाते हैं और तभी आपके जहन में आता है कि आपने गलत ट्रेन पकड़ ली है। अब आप क्या करेंगे? सामान्यत: जिस पल आपको अहसास होगा कि आप गलत मेट्रो में चढ़ गए हैं, आप उसी पल बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। अगर दरवाजे बंद हो गए होंगे तो आप पता करेंगे कि अगला स्टेशन कौन सा है, और किस स्टेशन पर उतरकर वहां से ऑफिस जाने के लिए मेट्रो मिलेगी। अगली मेट्रो कितनी देर में ऑफिस पहुंचाएगी और इस तरह आप कितने मिनट की देरी से अपने दफ्तर पहुंचेंगे।
क्रोनिक स्ट्रेस बन सकता है इन खतरनाक बीमारियों की वजह, रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी पड़ता है असर
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इस दौरान आपके शरीर में जो कुछ हुआ, वो सब कुछ उस हिरन के शरीर में भी होता है जब एक चीता उसका पीछा कर रहा होता है। आपका दिमाग भी ठीक यही करता है - जब आपको अपनी जान बचाने के लिए तेज दौड़ने की जरूरत होती है तो आप तेज दौड़ते हैं, जब आपको हिम्मत की जरूरत होती है तो आपमें हिम्मत आती है और जब आपको अंधेरे में देखना होता है तो आपकी पुतलियां बड़ी हो जाती हैं।
सरल शब्दों में कहें तो जब दिमाग के सामने एक तनावभरी स्थिति पैदा होती है तो वह शरीर की ऊर्जा को दूसरी जगहों से हटाकर तनावभरी स्थिति से निपटने में लगाता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई आपके ऊपर चाकू से वार करने जा रहा होगा तो आपका दिमाग आपके पैरों या जांघों में इतनी ताकत पहुंचाएगा कि आप वहां से भाग सकें। उस मौके पर दिमाग दिन में किए गए भोजन को पचाने में ऊर्जा खर्च नहीं करेगा या किसी चोट को ठीक करने में ऊर्जा नहीं लगाएगा, क्योंकि वो मौका जान बचाने का होता है। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि कम मात्रा में तनाव या स्ट्रेस आपके लिए जरूरी है, लेकिन अगर स्ट्रेस देने वाली घटनाएं बार-बार होने लगीं तो क्या होगा और ये कब क्रोनिक स्ट्रेस में तब्दील हो सकता है।
क्रोनिक स्ट्रेस क्या होता है?
दिल्ली के सेंट स्टीफेंस अस्पताल से जुड़ीं साइकेट्रिस्ट डॉक्टर रुपाली बताती हैं कि 'स्ट्रेस एक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो कि असामान्य और मुश्किल परिस्थितियों में सामने आती है।' सरल शब्दों में कहें तो स्ट्रेस या तनाव होने की वजहें रोजमर्रा की घटनाएं हो सकती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी को प्रपोज करना, इंटरव्यू देने जाना, ब्रेकअप होना, आईफोन गिर जाना, नौकरी से निकाले जाने की चेतावनी मिलना, बच्चे को चोट लगना, बाल गिरना, पेट साफ न होना या मोटापा बढ़ना आदि आदि। लेकिन अगर तनाव का ये दौर लंबा चलता है तो इससे आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पर असर होने लगता है, जिससे आपको डायबिटीज, दिल की बीमारी, अल्सर समेत तमाम मानसिक समस्याएं जैसे कि एंग्जाएटी और डिप्रेशन आदि हो सकती हैं।
डॉ. रुपाली कहती हैं, 'कुछ मात्रा में स्ट्रेस अच्छा होता है। क्लिनिकल भाषा में इसे पॉजिटिव स्ट्रेस कहते हैं। ये आपको आगे बढ़ने में मदद करता है, लेकिन जब यही स्ट्रेस आपके सोचने की शक्ति कम कर देता है, आपको पैरालाइज कर देता है तो ये नकारात्मक स्ट्रेस हो जाता है। नकारात्मक स्ट्रेस की प्रतिक्रिया हमारे दिमाग से आती है। हमारे दिमाग में एक सेंटर होता है हाइपोथेलमस, जो कई शारीरिक गतिविधियों और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ये हमारे ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम का भी सेंटर होता है। ऐसे में स्ट्रेस जब भी आता है तो तीन तरह से नजर आता है। इनमें एंग्जाइटी लक्षण, शारीरिक लक्षण, और भावनात्मक लक्षण शामिल होते हैं। एंग्जाइटी लक्षण में व्यक्ति बैचेन रहता है, अपना ध्यान एक जगह नहीं लगा पाता है, कई बार ऐसा लगता है कि जैसे व्यक्ति का दिमाग सुन्न हो गया हो, वो कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा हो।'
डॉक्टर रुपाली के अनुसार शारीरिक लक्षण में ये आपके शरीर पर असर करता है जैसे आपके दिल की धड़कने तेज हो जाती हैं, आपको लगता है कि टॉयलेट बार-बार जाना है, गला सूखने लगता है, जी मिचलाने लगता है या ऐसा लगता है जैसे पेट खराब हो गया हो।
क्रोनिक स्ट्रेस अपनी गिरफ्त में कैसे लेने लगता है?
ये नकारात्मक स्ट्रेस आपके शरीर पर असर दिखाने लगता है और उसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। डॉक्टर ये भी बताते हैं कि लगातार तनाव में रहने की वजह से लोग बार-बार बीमार होने लगते हैं और उन्हें इरेटब बाउल सिंड्रोम जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। डॉ. रुपाली बताती हैं, 'लोगों को क्रोनिक स्ट्रेस की स्थिति में साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर का सामना करना पड़ता है। इसका मतलब ये हुआ है कि जब आपके जहन का असर शरीर पर पड़ने लगता है तो कई तरह की समस्याएं सामने आती हैं, जिनमें एक समस्या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम है, दूसरा एसिडिटी या गैसट्राइटिस के लक्षण आना, कई बार कुछ लोगों में अस्थमा होता है तो वो दिक्कत देने लगता है।'