आशा देवी चेहरे पर गहरी खामोशी लिए शाम के खाने की तैयारी कर रही हैं। 26 दिन पहले ही उनके पति की मौत गले के कैंसर से हुई है। आशा देवी कहती हैं, 'डॉक्टर ने बोला इसे कैंसर हो गया है, इसे ले जाइए पटना, लेकिन हम नहीं जा पाए। कैसे जाते, न कोई साधन था न पैसा। आखिरी दिनों में बहुत तकलीफ में थे वो।'
बिहार के गांवों में आखिर क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मरीज? हैरान कर देगी यह रिपोर्ट
वहां से थोड़ी दूर ही सत्तर गांव में भारती अपने पति की तस्वीर लेकर बैठी हैं, जिनकी मौत छह महीने पहले ही हुई है। उनकी पांच साल की बेटी आंगन में खेल रही है। जब उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो वह कुछ बोल नहीं पाईं। उनके पति के बड़े भाई ने बताया कि भाई को लिवर कैंसर था। बड़े भाई ने बताया, 'हम लोग उसे दिल्ली ले जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ज्यादा गंभीर हुआ तो पहले सहरसा के अस्पताल लेकर गए, फिर पटना मेडिकल कॉलेज लेकर गए। वहीं उसकी मौत हो गई।' उनके भाई बताते हैं कि यहां इलाके में कोरोना से ज्यादा, कैंसर एक महामारी के रूप में फैल रहा है। ये परिवार पढ़ा-लिखा था और आर्थिक तौर पर मध्यम वर्ग कहा जा सकता है।
थोड़ी दूर मेनवा गांव के मनोज कुमार की मां को 2004 में मुंह का कैंसर हुआ था, जिसका उन्होंने बाकायदा इलाज करवाया, लेकिन अब फिर से उनका कैंसर लौट आया है। मनोज थोड़े गुस्से में बोले, 'मीडिया में जाने से भी कुछ होता नहीं है। सरकार को ध्यान देना चाहिए कि इस क्षेत्र में कैंसर इतना क्यों बढ़ रहा है, लेकिन सरकार तो चुनाव में व्यस्त है।'
मनोज का परिवार गांव का एक संभ्रात परिवार है। उनकी मां के कैंसर के इलाज में अब तक ढाई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। इस खर्चे के अलावा उन्हें मुख्यमंत्री चिकित्सा कोष से भी 80 हजार रुपये मिले थे। हालांकि, ये सहायता गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों के लिए होती है। वह कहते हैं, 'मेरी मां परेशान है और बस प्रार्थना कर रही हैं कि वो इस दुनिया से चली जाएं। इतने दर्द में इंसान और क्या कहेगा।'
ये तीनों परिवार एक ही इलाके के अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्ग से हैं। लेकिन, तीनों में ही परिजन कैंसर के शिकार हुए हैं। फर्क बस इतना है कि जागरूकता और इलाज तक सबकी पहुंच नहीं है।
अचानक कैंसर के इतने ज्यादा मामले क्यों
बिहार में सहरसा का सत्तर कटैया प्रखंड मानो कैंसर का केंद्र बन गया है। जब अचानक यहां कैंसर के कई मरीज निकलने लगे तो यहीं रहने वाले एक पत्रकार अरुण लाल ने छानबीन शुरू की। उन्होंने बताया, 'मेरे पिता की मौत भी कैंसर से हुई। सत्तर गांव में 10 हजार लोग रहते हैं और मैंने खोजना शुरू किया तो देखा कि 50 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी थी। 35 के करीब कैंसर मरीज मुझे और मिले। खबर छपने लगी तो सिविल सर्जन ने अपनी टीम यहां भेजी। वो भी देखकर हैरान रह गए कि इतने छोटे से गांव में इतने कैंसर के मरीज कैसे। इसके बाद यहां इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (आईजीआईएमएस) की टीम ने भी आकर देखा।'
आईजीआईएमएस से कैंसर सर्जन डॉक्टर शशि के नेतृत्व में एक टीम फरवरी में सत्तर गांव आई थी। उन्होंने यहां कैंप लगाकर कुछ लोगों के लक्षणों की जांच की थी। डॉक्टर शशि ने बताया, 'हम ये तो पता नहीं कर सके कि वहां इतना कैंसर किस वजह से फैल रहा है, लेकिन हमें वहां बड़ी संख्या में मरीज मिले। मान लीजिए हमारे पास अगर 70-80 लोग आए तो उनमें से 15 कैंसर मरीज मिले और ये काफी चिंताजनक बात है।'
डॉक्टर शशि बताते हैं कि उन्होंने ये रिपोर्ट सरकार के प्रतिनिधि को सौंप दी थी। हालांकि, इसके बाद सरकार की ओर से आगे की कोई कार्रवाई नहीं हो सकी और मार्च में कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन लग गया। पत्रकार अरुण लाल बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान ही यहां 15 कैंसर मरीजों की मौत हो चुकी है।