बीमार हैं तो ऐसे जल्दी ठीक हो सकते हैं
शरीर के अंगों का 'टाइम-टेबल'
दिन के 24 घंटों में हमारा शरीर अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह से काम करता है। इस बात को ग्रीस के महान चिकित्सक हिप्पोक्रैट ने बहुत पहले ही समझ लिया था। चीन के पारंपरिक चिकित्सक विज्ञान में भी इसका ज़िक्र किया गया है कि सुबह तीन से पांच बजे के दरमियान फेफड़े, सुबह 11 से दोपहर 1 बजे के दरमियान दिल और शाम 5 से 7 बजे के दरमियान गुर्दे बेहतर काम करते हैं। शायद इसी को बुनियाद बनाते हुए आज इस दिशा में नई रिसर्च की जा रही हैं। सर्केडियन बायोलॉजिस्ट जॉन ओ-नील की रिसर्च बताते हैं कि फाइब्रोब्लास्ट नाम की कोशिकाएं चोट की वजह से खराब होने वाले ऊतकों को दिन के समय जल्दी ठीक करती हैं। फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएं त्वचा की कोशिकाओं में पहुंच कर चोट की जगह तक पहुंचती हैं, और उसे ठीक करने में मदद करती हैं। प्रोफेसर ओ-नील ने इंटरनेशनल बर्न इंजरी डेटा बेस का आकलन करने के बाद रिसर्च में बताया कि जो लोग रात के समय में जल जाते हैं, उनके जख्म दिन में जलने वाले मरीज़ों के मुकाबले ठीक होने में 11 दिन ज्यादा लेते हैं।
अपने 'शरीर की घड़ी' को समझिए
इसके अलावा बीमारियों से लड़ने की शारीरिक क्षमता भी हमारे शरीर की घड़ी को प्रभावित करती है। शरीर में फैले किसी भी तरह के संक्रमण से लड़ने में इम्यून सिस्टम का मजबूत होना जरूरी है। वायरोलॉजिस्ट रशेल एडगर सर्केडियन रिदम और वायरल इंफेक्शन के सम्बन्ध पर रिसर्च कर रही हैं। उन्होंने चूहे पर दाद के वायरस की रिसर्च की है। उनका कहना है कि रात में ये वायरस 10 गुना ज्यादा सक्रिय हो जाता है, जबकि सुबह तक इसका असर काफी कम हो जाता है। ये बदलाव शायद प्रतिरोधी तंत्र के कम सक्रिय होने की वजह से होता है। संक्रमित कोशिकाओं की रिदम भी संक्रमण बढ़ाने में प्रभावी होती है। इसी तरह के नतीजे मौसमी बुखार में भी देखे गए। अगर दवा दोपहर के मुकाबले सुबह दी जाए, तो आराम जल्दी होता है। लेकिन ये भी सच है कि दिन के समय में ही बीमार होने का अंदेशा ज्यादा रहता है। अलग-अलग तरह के संक्रमण में एक जैसी थ्योरी भी लागू नहीं होती। सेप्सिस की ही मिसाल लीजिए। जब हमारा शरीर किसी रोग से लड़ते हुए ओवर रिएक्शन करता है, तो उसे सेप्सिस कहते हैं। ये कोई इंजेक्शन लगाने से भी हो सकता है। चूहों पर हुए एक प्रयोग में देखा गया है कि उन्हें अगर कीटाणुओं से लड़ने वाला इंजेक्शन रात में दिया जाए, तो उन में से 20 फीसदी ही बचते हैं, बाकी चूहे मर जाते हैं। जबकि यही इंजेक्शन दिन के वक्त दिया जाए, तो करीब 90 फीसदी चूहों की जान बच जाती है।
सही वक्त पर दवा लें
रिसर्च के ऐसे नतीजे संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों से लड़ने की रिसर्च को और आगे बढ़ाने में मददगार हैं। प्रोफेसर एडगर कहती हैं कि अगर ये पता हो कि किस खास वक्त में वायरस आस-पास की कोशिकाओं को प्रभावित कर रहा है, तो एंटी-वायरल थेरेपी के ज़रिए उसे फैलने से रोका जा सकता है। ऐसा करने से एंटी वायरल दवा की मात्रा भी कम की जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की करीब 250 बुनियादी और जरूरी दवाएं दुनिया के लगभग सभी अस्पतालों में मौजूद हैं लेकिन इन सभी को खाने का समय अलग-अलग है। इनका असर शरीर के अंदरूनी सेल्यूलर क्लॉक से संचालित होता है। इसकी वजह से दवाओं का असर कम या ज़्यादा हो सकता है। इसमें बुनियादी पेनकिलर, ब्लड प्रेशर, अस्थमा और कैंसर की दवाएं शामिल हैं। कुछ दवाएं ऐसी भी होती हैं, जिनकी ख़ुद बहुत कम उम्र होती है। इसका मतलब ये हुआ कि अगर उन दवाओं को बिल्कुल सही समय पर नहीं लिया गया, तो उनका असर कम हो जाता है। मिसाल के लिए ब्लड प्रेशर की गोली, वल्सार्टन सुबह के बजाय शाम को ली जाए तो 60 फीसदी तक असर करती है। इसी तरह एस्पिरिन भी शाम के समय ली जाए तो ज़्यादा असर करती है। एक अन्य रिसर्च में पाया गया है कि रेडिएशन थेरेपी का असर भी सुबह के मुकाबले दोपहर में ज्यादा होता है।
सबका शरीर एक तरह से काम नहीं करता
कौन सी दवाओं का असर कितना और किस समय ज्यादा होगा ये पता लगाना इतना आसान नहीं है। इसकी रिसर्च पर मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी। इसके अलावा मरीज सही समय पर दवाएं लेता रहे ये भी मुमकिन नहीं है। क्योंकि मरीज को दवाओं के पीछे का गणित नहीं समझाया जा सकता। बहुत बार मरीज को ठीक होने में इसलिए भी समय लगता है, क्योंकि वो समय पर अपनी दवाएं नहीं लेते। बहुत-सी दवाएं कोर्स में चलती हैं। इनकी एक भी खुराक छोड़ दी जाए तो पूरा कोर्स बेकार हो जाता है। लेकिन ये बात सभी मरीज समझ नहीं पाते।
हर इंसान की सर्केडियन रिदम भी अलग होती है। कुछ लोग सोने, जागने और खाने के मामले में समय की पाबंदी रखते हैं। तो, कई लोग देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने के आदी होते हैं। इसके अलावा आज एक बड़ी आबादी रात की शिफ्ट में काम करती है। जिसकी वजह से उनकी सर्केडियन रिदम बिल्कुल अलग हो जाती है इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ता है। फिलहाल किसी की अंदरूनी घड़ी की चाल जानने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसके अलावा आज अस्पतालों की इमारतें जिस तरह बन रही हैं, वो भी मरीज को जल्द ठीक करने या नहीं करने के लिए जिम्मेदार हैं। ज्यादातर अस्पतालों में छोटी खिड़कियां होती हैं, जिन पर दिन के समय भी पर्दे डले रहते हैं। मरीज ज्यादा समय तक आर्टिफिशयल लाइट में रहता है। जिससे उसकी बायोलॉजिकल रिदम प्रभावित होती है। इसके सबसे गहरे और साफ सबूत हमें दिल के मरीजों में मिलते हैं। कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की सर्केडियन रिदम सबसे ज्यादा मजबूत होती है। जब हम सो रहे होते हैं, तो हमारा ब्लड प्रेशर सबसे कम होता है। लेकिन हम जैसे ही जागते हैं, हमारा ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ता है।