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अध्ययन में दावा: संक्रमण से बनीं एंटीबॉडीज तीन महीने में नहीं होती हैं खत्म, इतने समय तक दे सकती हैं सुरक्षा

Tue, 10 Aug 2021 12:39 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Tue, 10 Aug 2021 12:39 PM IST
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antibodies against covid-19 remained stable seven months after the infection, recent study says
कोरोना के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडीज का स्तर - फोटो : Amar Ujala/Pixabay

दुनियाभार में कोरोना की तीसरी लहर को लेकर चर्चा का दौर जारी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना से बचाव के लिए शरीर में बनीं एंटीबॉडीज महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। शरीर में एंटीबॉडीज का निर्माण मुख्यरूप से दो तरह से होता है, पहला- संक्रमण के बाद स्वाभाविक रूप से निर्मित एंटीबॉडीज और दूसरी वैक्सीन से बनी एंटीबॉडीज। हालांकि यह एंटीबॉडीज कितने समय तक शरीर को संक्रमण से सुरक्षित रखने में सहायक हो सकती हैं? यह अब भी लोगों के लिए बड़ा सवाल बना हुआ है। इसी से संबंधित हाल ही में हुए एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है।


स्वास्थ्य कर्मियों के एक समूह पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार संक्रमण के सात महीने बाद तक शरीर में एंटीबॉडीज स्थिर रहती हैं, कुछ लोगों में इनका स्तर बढ़ता भी है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि शरीर में कॉमन कोल्ड कोरोनावायरस के खिलाफ पहले से मौजूद एंटीबॉडीज भी कोविड-19 से सुरक्षा दे सकती हैं। बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट को 'नेचर कम्युनिकेशंस' जर्नल में प्रकाशित किया गया है। आइए आगे की स्लाइडों में इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

antibodies against covid-19 remained stable seven months after the infection, recent study says
संक्रमण के बाद कितने समय तक बनी रहती हैं एंटीबॉडीज? - फोटो : Social media

महामारी की शुरुआत से ही किया गया अध्ययन
वैज्ञानिकों का कहना है कि महामारी को लेकर भविष्यवाणी करने और प्रभावी रणनीति विकसित करने के लिए लोगों में सार्स-सीओवी-2 वायरस के प्रति प्रतिरोधक क्षमता की प्रभाविकता और अवधि को बेहतर ढंग से समझना महत्वपूर्ण है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रमुख शोधकर्ता कार्लोटा डोबानो के नेतृत्व वाली टीम ने स्वास्थ्य कर्मियों के एक समूह पर महामारी की शुरुआत से ही अध्ययन किया। प्रोफेसर डोबानो कहते हैं, यह अपने प्रकार का पहला अध्ययन है जिसमें इतने बड़े पैनल पर एंटीबॉडीज के स्तर का मूल्यांकन किया गया है।

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संक्रमितों के ब्लड सैंपल लेकर किया गया अध्ययन - फोटो : Pixabay

अध्ययन में सामने आई यह महत्वपूर्ण बात
इस अध्ययन के लिए 578 प्रतिभागियों के रक्त के नमूनों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं की टीम ने मार्च से अक्टूबर 2020 के बीच अलग-अलग समय पर चार बार इन प्रतिभागियों के सैंपल लिए। ल्यूमिनेक्स तकनीक का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने सार्स के छह अलग-अलग एंटीजन के खिलाफ तमाम तरह की एंटीबॉडीज के स्तर को जानने की कोशिश की गई। 
अध्ययन के निष्कर्षों से पता चला कि स्वास्थ्य कर्मियों के बीच अधिकांश संक्रमण महामारी की पहली लहर के दौरान हुआ। प्रतिभागियों में मार्च से लेकर अक्टूबर के बीच एंटीबॉडीज के स्तर में  13.5 प्रतिशत से 16.4 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई।

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कोरोना से सुरक्षा देती हैं संक्रमण से बनी एंटीबॉडीज (सांकेतिक) - फोटो : iStock

संक्रमण के पांच महीने बाद बढ़ सकती हैं एंटीबॉडीज
अध्ययन के निष्कर्ष में वैज्ञानिकों ने पाया कि न्यूक्लियोकैप्सिड (एन) के खिलाफ आईजीएम और आईजीजी एंटीबॉडी को छोड़कर, बाकी आईजीजी एंटीबॉडीज का स्तर स्थिर बना रहा। अध्ययन के वरिष्ठ सह-लेखक जेम्मा मोनकुनिल बताते हैं, संक्रमण के पांच महीने के बाद से करीब 75 प्रतिशत प्रतिभागियों में आईजीजी एंटी-स्पाइक एंटीबॉडी के स्तर में की वृद्धि देखी गई। इस आधार पर कहा जा सकता है कि संक्रमण के बाद शरीर में बनीं एंटीबॉडीज सात महीने तक स्थिर बनी रह सकती हैं।

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एचसीओवी एंटीबॉडीज भी देती हैं कोरोना से सुरक्षा - फोटो : iStock

एचसीओवी भी कोरोना से देती हैं सुरक्षा
इसके अलावा वैज्ञानिकों ने बताया कि ह्यूमन कोल्ड कोरोनावायरस (एचसीओवी) के खिलाफ एंटीबॉडी के संबंध में पता चला है कि यह कोविड-19 संक्रमण के खिलाफ क्रॉस-प्रोटेक्शन प्रदान कर सकती हैं। सार्स-सीओवी-2 से संक्रमित लोगों में एचसीओवी एंटीबॉडीज का स्तर कम पाया गया। इसके अलावा जिन लोगों में कोरोना के एसिम्टोमैटिक लक्षण थे उनमें सिम्टोमैटि रोगियों की तुलना में एंटी-एचसीओवी आईजीजी और आईजीए एंटीबॉडीज का स्तर अधिक पाया गया। 


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स्रोत और संदर्भ: 
Seven-month kinetics of SARS-CoV-2 antibodies and role of pre-existing antibodies to human coronaviruses

अस्वीकरण नोट: यह लेख बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनके आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। ज्यादा जानकारी के लिए आप अपने चिकित्सक से संपर्क कर सकते हैं।

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