दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर से वायु प्रदूषण की चपेट में आता दिख रहा है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दिवाली से पहले ही दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) खराब होने लगा है। शुक्रवार को एक्यूआई 177 रहा, जिसे अस्वस्थ कैटेगरी का माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह की एक्यूआई अस्थमा, हृदय या फेफड़ों की समस्याओं वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाली हो सकती है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि एक्यूआई बढ़ने पर शरीर में क्या बदलाव होते हैं?
एयर पॉल्यूशन: दिवाली से पहले ही बढ़ने लगा प्रदूषण का खतरा, जानिए PM2.5 और PM10 में क्या अंतर है
AIR Pollution Delhi: PM2.5 और PM10 हवा में मौजूद प्रदूषण के कण होते हैं, जिनका अंतर उनके आकार में है। PM2.5 ज्यादा बारीक होने के कारण फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकता है, PM10 भी आंखों और श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकता है।
मेरठ की हवा में घुला जहर
दीपावली से पहले मेरठ की हवा लगातार खराब होती जा रही है। ज्योति पर्व से पहले हवा की गुणवत्ता में गिरावट ने चिंता बढ़ा दी है। 16 अक्तूबर को मेरठ का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 81 था, जो बृहस्पतिवार को बढ़कर 281 पर पहुंच गया। छह दिन में एक्यूआई में 200 अंकों की वृद्धि हुई है।
पीएम 2.5 और पीएम 10 के खतरे
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, PM2.5 और PM10 दोनों ही हवा में मौजूद छोटे-छोटे कण होते हैं, जो धूल-धुएं, वाहनों के उत्सर्जन, निर्माण कार्य और ईंधन जलने जैसी प्रक्रियाओं से निकलते हो सकते हैं। इन कणों का आकार जितना छोटा होता है, उनके सांस के जरिए शरीर के अंदर गहराई तक पहुंचने की आशंका उतनी अधिक हो सकती है। यही वजह है कि PM2.5 को स्वास्थ्य के लिहाज से विशेष चिंता का विषय माना जाता है। हालांकि, PM 10 थोड़े बड़े आकार के होते हैं फिर भी इससे सेहत को नुकसान पहुंच सकता है।
पीएम 2.5
- ये बेहद बारीक कण होते हैं। इसका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं। इतना ही नहीं कुछ कण खून के संचार में पहुंच कर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी जा सकते हैं। यही कारण है कि इससे हृदय और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा देखा जाता रहा है।
पीएम 10
- ये पीएम 2.5 से अपेक्षाकृत बड़े कण होते हैं, जिनका 10 माइक्रोमीटर तक हो सकता है। ये मुख्यरूप से धूल, परागकण और सड़क या निर्माण कार्य से उड़ने वाले कण होते हैं। इनसे नाक, गले और श्वसन तंत्र में जलन का खतरा देखा जाता रहा है। कुछ कण फेफड़ों तक भी पहुंच सकते हैं।