कोरोना वायरस ने बड़े से बड़े देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हवा निकालकर रख दी। जो भी देश अपने वहां के अस्पतालों को सबसे बेहतर बताता था, वो ही इस बीमारी के आगे घुटने टेकता हुआ नजर आया। लगभग सभी देशों की यही स्थिति थी, जहां अस्पतालों में मरीजों को रखने तक की जगह नहीं थी। सरकारों को अस्थाई अस्पतालों का निर्माण तक करना पड़ा था। इन सबके बीच देश में स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति और खराब गुणवत्ता पर आर्थिक सर्वेक्षण में किए गए उल्लेख चौंकाने वाले हैं, जिसमें कहा गया है कि देश में इलाज नहीं मिलने के कारण होने वाली मौतों से ज्यादा खराब इलाज से होने वाली मौते हैं। तो चलिए जानते हैं इस अध्ययन के बारे में।
खराब इलाज की वजह से गई ज्यादा लोगों की जान, अध्ययन में हुए कई चौंकाने वाला खुलासे
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दरअसल, अनेक अध्ययनों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि देश में खराब इलाज होने की वजह से मौतें ज्यादा हुई हैं। ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सिस्टम की भांति स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी मानक तय करने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में साल 2018 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, देश में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता नहीं होने के कारण 8,38,473 लोगों ने अपनी जान गवाई। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा बताता है कि जिन लोगों की मौत खराब इलाज के कारण हुई, उनकी संख्या 15,99,870 है।
खराब इलाज के कारण हुई मौतों की संख्या स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के कारण हुई मौतों के मुकाबले लगभग दोगुनी है। रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि देश में खराब स्वास्थ्य सेवाओं के कारण प्रति एक लाख पर 119-208 लोगों की जान जाती है। रिपोर्ट बताती है कि ऐसे मरने वालें लोगों की संख्या पड़ोसी देशों में सबसे ज्यादा है। बात पाकिस्तान की करें तो वहां इलाज न मिलने से 6,55,334 लोगों की मौत हुई और खराब इलाज के कारण जिन लोगों ने अपनी जान गवाई उनकी संख्या 2,25,389 है। नेपाल में इलाज न मिलने से 73.047 और खराब इलाज की वजह स 1,31,744 लोगों की मौत हुई।
बांग्लादेश में भी हालात कुछ ऐसे ही नजर आए। जहां एक तरफ इलाज न मिलने से 50,708 लोगों की मौत हुई, तो वहीं दूसरी तरफ खराब इलाज की वजह से 1,53,327 लोगों को अपनी जान से हाथ धोनी पड़ा। रिपोर्ट ये भी बताती है कि पीएमजेवाई के साल 2019 के आंकड़े बताते हैं कि जो लोग अस्पताल में दोबारा भर्ती होते हैं वो औसत 7.5 दिन ही रह पाते हैं, और जो लोग पहली बार भर्ती होते हैं वो औसतन 6.6 दिन। ये रिपोर्ट साफ बताती है कि जो लोग अस्पतालों में दोबारा भर्ती होते हैं उनके इलाज की अवधि अधिक होती है।
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि निजी क्षेत्र जहां शहरी क्षेत्रों में 74 फीसदी ओपीडी एवं 65 फीसदी अस्पताल सेवाएं प्रदान कर रहा है, लेकिन ये विनियमित नहीं है। इसलिए निजी अस्पतालों में मृत्यु दर दोबारा भर्ती के मामले और उपचार की कीमत भी ज्यादा है। बात निजी अस्पतालों में नवजातों की मृत्यु दर की करें तो, ये यहां 3.81 फीसदी पाई गई है। वहीं, सरकारी अस्पतालों में ये सिर्फ 0.61 फीसदी है। यही नहीं, जो लोग निजी अस्पातल में दोबारा भर्ती होते हैं उनकी संख्या 70 फीसदी है, जबकि सरकारी अस्पताल में दोबारा भर्ती होने वालों की संख्या 64 फीसदी है।