कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए हर्ड इम्यूनिटी को सबसे अहम हथियार माना जा रहा है। हर्ड इम्यूनिटी को पैदा करना अब पहले से और आसान हो सकता है। हाल ही में हुए एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि हर्ड इम्यूनिटी को पैदा करने के लिए पहले जितने लोगों को इन्फेक्ट होने की जरुरत समझी जा रही थी, दरअसल अब उससे भी कम लोगों से अच्छा परिणाम मिल सकता है। दुनियाभर में अभी करीब 96 लाख लोग इस घातक वायरस की चपेट में चुके हैं।
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क्या होती है हर्ड इम्यूनिटी?
कोरोना से पूरी तरह निजात पाने के लिए वैक्सीन जरूरी है। इसके लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक लगे हैं, लेकिन इसे तैयार होने में अभी लंबा समय लग सकता है। ऐसे में विशेषज्ञों के एक बड़ा वर्ग द्वारा पिछले दिनों हर्ड इम्यूनिटी अपनाने पर जोर दिया जा रहा था। हर्ड इम्यूनिटी यानी 60 से 70 फीसदी आबादी का या तो वैक्सीन से इम्यून कर दिया जाना या फिर उनके बीच संक्रमण फैलने देना। लेकिन अभी हाल ही हुए एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि सिर्फ 43 फीसदी आबादी से हर्ड इम्यूनिटी पैदा की जा सकती है।
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'साइंस' जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी को यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम और यूनिवर्सिटी ऑफ स्टॉकहोम के गणितज्ञों ने किया है। इस स्टडी में यह अनुमान लगाया गया है कि वायरस के फैलाव को रोकने के लिए सिर्फ 43 फीसदी आबादी को इन्फेक्ट होने की जरूरत है। जबकि इससे पहले अनुमान लगाया गया था कि कम से कम 60 फीसदी आबादी के इन्फेक्टेड होने पर हर्ड इम्यूनिटी पैदा हो सकती है।
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ऐसे हुई स्टडी
इस स्टडी के दौरान लोगों को उम्र के हिसाब से 6 श्रेणियों में बांटा गया था और ऐक्टिविटी यानी सक्रियता को 3 श्रेणियों में बांटा गया था। स्टडी में पाया गया कि हर उम्र में 50 फीसदी लोग सामान्य तरह से सक्रिय होते हैं जबकि 25 फीसदी लोग बेहद कम या बेहद ज्यादा सक्रिय होते हैं। इसके साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया कि एक शख्स से औसतन 2.5 लोग संक्रमित हो सकते हैं।
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सक्रियता का असर
वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के दौरान पाया कि कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में उम्र से ज्यादा सक्रियता का असर पड़ता है। ऐसे लोग, जो समाज में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं, उन्हें इंफेक्शन होने और उनसे फैलने की सबसे ज्यादा संभावना रहती है।