संजय गांधी को भारतीय राजनीति का ऐसा पोस्टर ब्वाय कहा जा सकता है जो जितने लोकप्रिय थे उतनी ही उनके नाम की दहशत भी थी। आपातकाल और उसके बाद के कुछ सालों की राजनीति के केंद्र में संजय ही रहा करते थे। कुछ लोग आपातकाल के लिए उन्हें ही जिम्मेदार मानते हैं तो ये मानने वाले भी कम नहीं मिलेंगे कि संजय गांधी अगर कुछ दिन और जिंदा रहते तो देश की राजनीति की दशा और दिशा कुछ और ही होती। आज संजय गांधी की पुण्य तिथि है, ऐसे में याद करते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्सों को।
संजय गांधीः जिसके नाम से कांपने लगी थी राजनीति, जानिए 10 किस्से
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संजय गांधी को रफ्तार का बहुत शौक था, चाहे वह कार की हो या हवाई जहाज की। उनका यही शौक उनकी जान का दुश्मन बना। जिस दिन उनकी मौत हुई उस दिन वह दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर कैप्टन सुभाष सक्सेना के साथ उड़ान पर निकले थे। उड़ने के कुछ मिनट बाद ही जहाज का इंजन बंद हो गया और कुछ सेकेंड बाद ही वह अशोका होटल के पीछे जाकर गुम हो गया।
23 जून 1980 की सुबह हुए इस हादसे में मात्र 32 साल की उम्र में ही संजय गांधी की मौत हो गई थी। उनके साथ ही कैप्टन सक्सेना भी इस हादसे में मारे गए थे। मौत से एक दिन पहले ही संजय गांधी ने पत्नी मेनका गांधी को अपने टू सीटर हवाई जहाज में बैठाकर दिल्ली के आसमान में कई चक्कर लगाए थे।
संजय गांधी ने बहुत कम उम्र में राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी। कहा जाता है कि आपातकाल के पहले और बाद के इंदिरा गांधी की राजनीति को पर्दे के पीछे से संजय ही संचालित करते थे। इंदिरा के ऑफिस से निकलकर तमाम फाइलें उनके छोटे बेटे के ऑफिस पहुंचती थी इसके बाद ही उन पर अमल होता था। तेजी से राजनीति में छाने का मंसूबा लेकर आए संजय गांधी के दौर में ही यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई जैसे युवा संगठनों को ऊर्जा मिली और उन्होंने तेजी से पूरे देश में पकड़ बनाई। उस दौर में तमाम अखबारों में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हुडदंग और बवाल के किस्से छाए रहते थे।
अपने बड़े भाई की तरह ही संजय गांधी भी प्रशिक्षित पायलट थे, लेकिन उन्होंने इसे पेशे के तौर पर नहीं अपनाया। वह मां की तरह राजनीति में आगे बढ़ने के इरादे लेकर आए थे, इसलिए संजय के दौर में राजीव पूरी तरह किनारे रहे। शायद पायलट के पेशे को छोड़कर राजनीति में आने की उनकी कोई रुचि नहीं थी। वहीं संजय गांधी पूरी तरह राजनीति को आत्मसात करना चाहते थे इसलिए अपनी मां से जुड़े तमाम छोटे बड़े फैसलों में उनकी राय समाहित रहती थी।