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पुदुचेरी: ऑरोविल में ताड़ महोत्सव, बच्चों ने पेड़ से खाना भी बनाया और संस्कृति भी समझी
Sun, 30 Aug 2026 06:22 PM IST
राहुल कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, ऑरोविल।
अमर उजाला ब्यूरो, ऑरोविल।
Published by: राहुल कुमार
Updated Sun, 30 Aug 2026 06:22 PM IST
सार
तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में ऑरोविल के इसाई अंबलम स्कूल में दो दिवसीय ताड़ महोत्सव शुरू हुआ, जिसमें बच्चों ने ताड़ से खाना बनाया, हस्तशिल्प तैयार किया और पारंपरिक खेलों में हिस्सा लिया। पढ़ें क्यों खास था यह आयोजन...
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इसाई अंबलम स्कूल में दो दिवसीय ताड़ महोत्सव।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जिस पेड़ के पत्तों पर सदियों तक तमिल साहित्य लिखा और सहेजा गया, उसी ताड़ को नई पीढ़ी से दोबारा जोड़ने की कोशिश शनिवार से यह शुरू हुई। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में ऑरोविल के इसाई अंबलम स्कूल में दो दिवसीय ताड़ महोत्सव शुरू हुआ, जिसमें बच्चों ने ताड़ से खाना बनाया, हस्तशिल्प तैयार किया और पारंपरिक खेलों में हिस्सा लिया। आयोजन ऑरविल फाउंडेशन और शिक्षा मंत्रालय ने मिलकर किया। इसमें ऑरोविल और आसपास के पुदुचेरी क्षेत्र के बच्चे, शिक्षक और अभिभावक शामिल हुए।
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महोत्सव का मकसद बच्चों को यह बताना था कि ताड़ तमिल जीवन में सिर्फ एक पेड़ नहीं है। गर्मियों में नुगु, सुबह का पदनीर, साल भर का ताड़ का गुड़, छत छाने के लिए पत्ते और लिखने के लिए ओलै, यनी पत्तों की पट्टियां, सब इसी एक पेड़ से आते रहे हैं। तमिलनाडु का राजकीय वृक्ष भी यही है। पछले कुछ दशकों में ताड़ पर टिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिकुड़ी है और पेड़ पर चढ़ने वाला हुनर भी नई पीढ़ी तक नहीं पहुंचा है।
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बच्चों ने ताड़ से मिलने वाली चीजों से कई खाद्य पदार्थ खुद तैयार किए। इनमें ताड़ के फल का जैम, पनंगूड़ यानी ताड़ की जड़ के आटे से बना पौष्टिक पेय, जड़ के आटे के लड्डू, केक, बिस्कुट और ताजा पेय शामिल रहे। पारंपरिक ताड़ का गुड़, अधिरसम और पनियारम जैसे व्यंजन भी प्रदर्शित किए गए। आयोजकों के मुताबिक इनका मकसद यह दिखाना भी था कि ताड़ से बने उत्पादों में स्थानीय स्तर पर रोजगार की गजाइश बची हुई है। ताड़ के पत्तों से सामान बनाने की कार्यशालाएं अलग से रखी गईं। इनमें पत्तों से चटाई बुनना, कानों के झुमके, चाबी के छल्ले और दीवार सजाने का सामान बनाना सिखाया गया।
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सांस्कृतिक सत्र में विल्लुपाट्टु और कुम्मी पाट्टु की प्रस्तुतियां हुईं। विल्लुपाट्टु दक्षिण तमिलनाडु की वह लोक शैली है जिसमें धनुष को वाद्य की तरह बजाकर कथा सुनाई जाती है और कुम्मी में महिलाएं गोल घरे में ताली की लय पर नाचती हैं। बच्चों के लिए ताड़ के बीज फेंकना, पत्तों की टोकरी भरना, लकड़ी पर संतुलन बनाकर चलना, पेड़ का चित्र बनाना और ताड़ पर चढ़ने का शुरुआती प्रदर्शन जैसी गतिविधियां भी हुईं।
आयोजकों का कहना है कि महोत्सव को भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान की पढ़ाई को जोड़ने के प्रयोग की तरह देखा जा रहा है। परिसर में गोशाला की देखभाल और श्री अरविंद इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजकेशनल रिसर्च के तहत होने वाले शोध कार्य को भी बच्चों की रोजमर्रा की पढ़ाई का हिस्सा बताया गया। आयोजन ऑरोविल फाउंडेशन की सचिव और गुजरात सरकार में अपर मुख्य सचिव डॉ. जयंती एस. रवि की पहल पर हुआ।
ताड़ क्यों है तमिल घरों का कल्पवृक्ष
तमिल परंपरा में ताड़ को घर का पेड़ माना जाता रहा है, क्योंकि इसका लगभग हर हिस्सा काम आता है। गर्मियों में इसका कच्चा फल नुंगु ठंडक देता है और सुबह उतारा गया रस पदनीर कहलाता है। इस रस से ताड़ का गुड़ बनता है, जो चीनी के आने से पहले दक्षिण के रसोईघरों की मिठास था। जड़ का आटा सूखे के दिन में भोजन का सहारा बनता रहा। पत्तों से चटाई, टोकरी, पंखे और छपर बनते रहे और इन्हीं पत्तों की पट्टियों पर तमिल का शस्त्रीय साहित्य लिखा गया। यही वजह है कि ताड़ के आसपास लोकगीत, कहावतें और पूरा एक ग्रामीण पेशा विकसित हुआ, जो अब सिमट रहा है।