आज दुनिया में खास तौर से भारतीय उपमहाद्वीप में शायद ही कोई ऐसा हो जो मदर टेरेसा को न जानता हो। 26 अगस्त, 1910 को मेसिडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर में जन्मी मदर टेरेसा आज भी अपनी ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ संस्था के रूप में लोगों के बीच जीवंत मानी जाती हैं। आज पूरा देश ही नहीं बल्कि दुनिया मदर टेरेसा की 108वीं जयंती मनाकर उन्हें याद कर रही है।
सेवा भाव का दूसरा नाम है मदर टेरेसा
मदर टेरेसा एक रोमन कैथोलिक सन्यासिनी और ईसाई धर्म प्रचारक थी। उन्होंने असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों को अपनी ममता व प्रेम लुटाकर अपना जीवन सेवा भाव में समर्पित कर दिया। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी आज 123 मुल्कों में सक्रिय है, इसमें कुल 4,500 सिस्टर हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं मदर टेरेसा
मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। भारत रत्न, टेम्पटन प्राइज, ऑर्डर ऑफ मेरिट और पद्म श्री से भी मदर टेरेसा को नवाजा गया है। 19 अक्टूबर 2003 को उन्हें 'कलकत्ता की भाग्यवान टेरेसा' की उपाधि भी दी गयी थी। इसके बाद दिसम्बर 2015 में पॉप फ्रांसिस ने के रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा उन्हें संत की उपाधि दी गयी थी। संत बनने की उनकी विधि 4 सितम्बर 2016 को हुई थी।
मदर टेरेसा के पास थी 5 देशों की नागरिकता
मदर टेरेसा के पास 5 देशों की नागरिकता अलग-अलग वक्त पर रही। इनमें ऑटोमन, सर्बिया, बुल्गेरिया, युगोस्लाविया और भारत शामिल रहे। मदर टेरेसा के बचपन का नाम Aneze Gonxhe Bojaxhiu था, जिसका मतलब छोटा फूल होता है।
जब मदर टेरेसा ने नीले नीले बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहननी शुरू की
मदर टेरेसा ने साल 1948 में कलकत्ता में काम शुरू किया और नन के परिधान के बजाय नीले बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहननी शुरू की। मदर टेरेसा कहती थीं कि जख्म भरने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठ से कहीं ज्यादा पवित्र होते हैं।