असम का बोडोलैंड, जहां कभी विद्रोहियों के हमलों की गूंज थी, लोगों का खून बहाया जाता था, अब वहां शांति और विकास का युग तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस सप्ताह 2020 में हुए बोडो शांति समझौते की 5वीं वर्षगांठ पर बोडोलैंड में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। दुनिया के लोग, बोडोलैंड को अब विकास के लिए पहचानें, इसके लिए कई सारे सकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।
बोडोलैंड में जानवरों को निशाना बनाने वाले 57 शिकारियों की एक अनूठी कहानी सामने आई है। वे शिकारी अब 'दुश्मन' से 'दोस्त' बन चुके हैं। रायमोना राष्ट्रीय उद्यान में गोल्डन लंगूर, क्लाउडेड तेंदुआ, हिमालयी काला हिरण, एशियाई हाथी, रॉयल बंगाल टाइगर, धूमिल तेंदुआ, भारतीय गौर, जंगली जल भैंसा और चित्तीदार हिरण सहित दूसरी ऐसी कई प्रजातियों की रक्षा कर रहे हैं, जो मौजूदा समय में लुप्तप्राय अवस्था में हैं। सभी पूर्व शिकारी अब वन विभाग के साथ मिलकर जंगल और वहां रहने वाले जानवरों के रक्षक बन गए हैं।
भले ही अभी उन्हें मामूली सा भत्ता मिल रहा है, मगर रायमोना गोल्डन लंगूर इको टूरिज्म सोसाइटी और बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद के चीफ प्रमोद बोरो, इन पूर्व शिकारियों को वन विभाग में स्थायी जॉब दिलाने के लिए ठोस प्रयास कर रहे हैं।
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नेशनल पार्क
- फोटो : Amar Ujala
बता दें कि असम सरकार ने बोडो शांति समझौता होने के बाद 2021 में रायमोना को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। रायमोना राष्ट्रीय उद्यान प्रमुख तौर से गोल्डन लंगूर के लिए प्रसिद्ध है। यह उद्यान असम के सुदूर पश्चिमी हिस्से में बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र के कोकराझार जिले के गोसाईगांव और कोकराझार उपखंडों में फैला हुआ है। इस उद्यान की विशेषता, यहां की समृद्ध जैव विविधता और अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र है। रायमोना राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर में भूटान का फिप्सू वन्यजीव अभयारण्य है तो वहीं पश्चिम हिस्से में पश्चिम बंगाल का बक्सा टाइगर रिजर्व है। इसके अलावा पूर्व के हिस्से में मानस राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। इस राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिम में सोनकोश नदी का बहाव है तो वहीं पूर्व में सरलभंगा नदी बहती है। इन दोनों नदियों को ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियां कहा जाता है।
रायमोना गोल्डन लंगूर इको टूरिज्म सोसाइटी के सीनियर एडवाइजर सोमनाथ नरजारी ने कहा, 2021 में जब रायमोना नेशनल पार्क को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था, उससे पहले यहां पर शिकार की घटनाएं होती रहती थी। लुप्तप्राय जानवरों को निशाना बनाया जाता था। जंगल और जानवर, दोनों को नुकसान हो रहा था। पहले यह पता लगाया गया कि शिकारी कौन हैं। मालूम हुआ कि वे आसपास के गांवों के रहने वाले हैं। इसके बाद वन विभाग और रायमोना गोल्डन लंगूर इको टूरिज्म सोसाइटी ने शिकारियों से बातचीत की। उन्हें बोडोलैंड के इस नेशनल पार्क का महत्व बताया गया कि यह क्षेत्र किस तरह से आसपास के इलाके को पर्यटन की द्रष्टि से विश्व पटल पर ला सकता है।
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रायमोना गोल्डन लंगूर इको टूरिज्म सोसाइटी के सीनियर एडवाइजर सोमनाथ नरजारी
- फोटो : Amar Ujala
बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद के (बीटीसी) चीफ प्रमोद बोरो ने भी शिकारियों को आश्वस्त किया कि वे शिकार करना छोड़ देते हैं तो उन्हें मुख्यधारा में शामिल कर लिया जाएगा। बीटीसी चीफ प्रमोद बोरो ने कहा, देखिये रायमोना एक नया नेशनल पार्क है। इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना होगा। अगर ये प्रोजेक्ट देश दुनिया के पटल पर आता है तो इसका फायदा समस्त बोडालैंड को होगा। क्षेत्र में पर्यटक आएंगे, जिससे राजस्व बढ़ेगा और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलने की संभावना बढ़ जाएंगी। बोडोलैंड में मानस और रायमोना, दोनों नेशनल पार्क में शिकारियों की एक बड़ी संख्या देखी गई थी। जब बातचीत शुरु हुई तो दोनों ही पार्कों से सैंकड़ों शिकारियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। सोमनाथ नरजारी ने बताया, ये शिकारी जंगल के चप्पे चप्पे से वाकिफ हैं। इन्हें जानवरों की दिनचर्या की जानकारी भी रहती है।
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बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद के चीफ प्रमोद बोरो
- फोटो : Amar Ujala
अब 57 पूर्व शिकारी, वन विभाग के साथ मिलकर जंगल और जानवरों की सुरक्षा कर रहे हैं। वे गाइड की भूमिका भी निभाते हैं। उन्हें वन्य प्राणी जीवों से संबंधित कानूनों की भी जानकारी दी गई है। अब वे सभी लोग वन विभाग के स्वयंसेवक की भूमिका में आ चुके हैं। उन्हें वन से जुड़ी दूसरी गतिविधियों में शामिल करने की योजना बनाई जा रही है। नरजारी के मुताबिक, अभी तक इन्हें लगभग पचास हजार रुपये की एकमुश्त वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। उम्मीद है कि जल्द ही वे वन विभाग में स्थायी जॉब पाने में कामयाब होंगे।
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पूर्व शिकारी, जो अब रक्षक बन गए हैं
- फोटो : Amar Ujala
पूर्व शिकारी ओडेन मुसाहारी कहते हैं, ये हमारे जीवन की एक बड़ी घटना थी। रायमोना गोल्डन लंगूर इको टूरिज्म सोसाइटी ने हमसे संपर्क किया था। हमें बताया गया कि अगर वे शिकार करना छोड़ देते हैं तो उन्हें मुख्य धारा में शामिल कर लिया जाएगा। हमसे कहा गया कि अब बोडोलैंड में शांति समझौता लागू है, ऐसे में असम सरकार और बीटीसी, दोनों मिलकर उनके लिए विकास की नई राहें तलाश सकते हैं। इसके बाद उन्होंने जंगल में शिकार करने का इरादा त्याग दिया। वे जानवरों के दोस्त बन गए हैं। हमारा प्रयास है कि यह पार्क, देश और दुनिया का एक अनूठा नेशनल पार्क बने।