भारत और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख की गलवां घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से ही एशिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। चीन ने कहा है कि वह अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देने के लिए बीस मार्शल आर्ट ट्रेनर तिब्बत भेज रहा है।
भारतीय सेना के 'घातक कमांडो' क्यों हैं खास, कैसे अभियानों को देते हैं अंजाम, जानें पूरा इतिहास
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
'घातक प्लाटून' की खासियत क्या है?
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, ये उन लोगों का प्लाटून होता है जो अपनी यूनिट के सबसे तगड़े जवान माने जाते हैं। इन लोगों को जूडो, कराटे किकबॉक्सिंग और मार्शल आर्ट जैसी तकनीक सिखाई जाती हैं। उन्होंने बताया कि लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सैनिक सिर्फ बिना हथियारों के ही लड़ते हैं। हथियारों की भी इनके पास बेहतरीन ट्रेनिंग होती है।
सेना के एक रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, लोगों के बीच ये गलत धारणा है कि ये सैनिक सिर्फ बिना हथियारों के ही युद्ध में हिस्सा लेते हैं। लेकिन सच यह है कि इनके पास दूसरे सैनिकों की तरह हथियारों की भी ट्रेनिंग होती है। निहत्थे लड़ना इनकी एक अतिरिक्त खूबी है।
सेना के जानकारों ने बताया कि हर इंफेंट्री यूनिट के साथ ऐसे सैनिक मौजूद रहते हैं और चुनौतीपूर्ण अभियानों में इनकी मदद ली जाती है। सेना जब किसी मोर्चे पर तैनात होती है तो वह तरह के सैनिकों के साथ होती है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि कहीं केवल सिर्फ घातक कमांडो हैं या कहीं सिर्फ हथियारों से लड़ने वाले सैनिक। जिस तरह की परिस्थितियां होती है, उसके अनुसार सैनिकों को तैनात किया जाता है।
यह भी पढ़ें: डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, जैसे-जैसे कोरोना बढ़ेगा, चीन के खिलाफ मेरा गुस्सा और बढ़ता जाएगा
प्लाटून में चुना जाना जवान के लिए गर्व की बात
वहीं, 'घातक प्लाटून' में चुनाव के लिए उपलब्ध होने का फैसला खुद सैनिक का होता है। इन सभी लोगों में जो सबसे अच्छे सैनिक होते हैं, उन्हें प्लाटून में जगह दी जाती है।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, प्लाटून में चुना जाना किसी भी जवान के लिए गर्व की बात होती है, क्योंकि वे अपने यूनिट के सबसे तगड़े जवान माने जाते हैं। बिना हथियारों के लड़ने की काबिलियत के अलावा, उन्हें शूटिंग करने की, पानी, कचरे और दलदल जैसी मुश्किल जगहों पर जाने की ट्रेनिंग भी दी जाती है।
उन्होंने बताया कि इसके अलावा ये सैनिक कई दूसरी तरह की कठिन ट्रेनिंग से भी गुजरते हैं। यूनिट के सैनिकों को नक्शा समझने, कम राशन और दुर्गम जगहों पर रहने के लिए जीवन रक्षा प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
यह भी पढ़ें: प्रतिबंधों की काट तलाशने में जुटा चीन, सिंगापुर और हांगकांग के जरिए भारत में कर सकता है निवेश
कौन होता है कमांडर?
प्रसाद के मुताबिक करगिल की लड़ाई और सर्जिकल स्ट्राइक में घातक प्लाटून ने अहम भूमिका निभाई थी और ये चीन के सैनिकों से लड़ने के भी काबिल हैं। उनके मुताबिक इस यूनिट का कमांडर एक अफसर रैंक का व्यक्ति होता है।
उन्होंने बताया, आमतौर पर कोई युवा कैप्टन या मेजर इसका कमांडर होता है। यूनिट में जेसीओ, हवलदार और नाइक रैंक के सैनिक भी होते हैं। ये सभी युवा लोग होते हैं। सबसे ज्यादा आवश्यक कमांडो का मजबूत और काबिल होना होता है।
यह भी पढ़ें: लद्दाख गतिरोध: 12 घंटे तक चली भारत और चीन के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की तीसरे दौर की वार्ता
घातक प्लाटून का इतिहास
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद ने बताया, चीन के साथ 1962 के युद्ध के बाद हर इंफेंट्री में एक प्लाटून नियुक्त किया गया था, जिसका नाम कमांडो प्लाटून होता था। एक प्लाटून में करीब 30 व्यक्ति होते हैं। उन्होंने बताया कि यूनिट के सबसे तगड़े युवा ऑफिसर को कमांडर चुना जाता था।
प्रसाद ने बताया कि उस दौर में कमांडो प्लाटून का काम यही होता था कि किसी ऐसी परिस्थिति में जब गुत्थमगुत्था होना पड़े या दुश्मन के पीछे जाना पड़े या कहीं घात लगाना पड़े, तो इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।
उन्होंने बताया कि इसी वजह से 'कमांडो प्लाटून' का नाम बदल कर 'घातक प्लाटून' कर दिया गया और इनके कमांडरों को अधिक काबिल बनाने के लिए कई तरह की नई ट्रेनिंग दी जाने लगीं।
यह भी पढ़ें: एप्स पर पाबंदी से तिलमिलाया चीन, अंतरराष्ट्रीय कानून का देने लगा हवाला