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विधवा मां के लिए आत्मनिर्भर योग्य वर खोजता बेटा

Thu, 14 Nov 2019 08:39 AM IST
योगेश साहू बीबीसी, हिंदी
बीबीसी, हिंदी Published by: योगेश साहू Updated Thu, 14 Nov 2019 08:39 AM IST
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In West Bengal Son seeks self Independent sufficient Groom for his widowed mother On Facebook
अपनी मां के साथ गौरव - फोटो : BBC

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में फ्रेंच कॉलोनी रहा चंदननगर अक्सर जगद्धात्री पूजा और बिजली के कारीगरों की वजह से सुर्खियों में रहता है। लेकिन इस बार वो इलाके के एक युवक गौरव अधिकारी के फेसबुक पर लिखे इस पोस्ट के कारण सुर्खियों में है। इसी महीने आस्था नामक एक युवती ने भी अपनी मां के लिए 50 साल के एक सुंदर व्यक्ति की तलाश में एक ट्वीट किया था। वो ट्वीट काफी वायरल हुआ था।



आस्था ने कहा था कि वह अपनी मां के लिए जो आदमी तलाश रही हैं उसे जीवन में काफी स्थापित और शाकाहारी होना चाहिए। इसके अलावा वो शराब नहीं पीता हो।पांच साल पहले गौरव के पिता का निधन हो गया था। उसके बाद उनकी 45 वर्षीया मां घर में अकेले ही रहती हैं। लेकिन आखिर उन्होंने फ़ेसबुक पर ऐसी पोस्ट क्यों लिखी?

गौरव बताते हैं, "मेरे पिता कुल्टी में नौकरी करते थे। वर्ष 2014 में उनके निधन के बाद मां अकेले पड़ गई हैं। मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान हूं। मैं सुबह सात बजे ही नौकरी पर निकल जाता हूं और लौटने में रात हो जाती है। पूरे दिन मां अकेले ही रहती हैं। मुझे महसूस हुआ कि हर आदमी को साथी या मित्र की जरूरत है।"

In West Bengal Son seeks self Independent sufficient Groom for his widowed mother On Facebook
गौरव - फोटो : BBC
क्या आपने इस पोस्ट को लिखने से पहले अपनी मां से बात की थी?

गौरव ने बताया, "मैंने मां से बात की थी। मां मेरे बारे में सोच रही हैं। लेकिन मुझे भी उनके बारे में सोचना है। एक संतान के तौर पर मैं चाहता हूं कि मां के जीवन के बाकी दिन बेहतर तरीके से गुजरें।"


क्या लिखा था गौरव ने?

गौरव ने आखिर अपने फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा है? उन्होंने लिखा है, "मेरी मां डोला अधिकारी हैं। मेरे पिता का निधन पांच साल पहले हो गया था। नौकरी की वजह से मैं अधिकतर घर से बाहर रहता हूं। इससे मां अकेली पड़ जाती हैं। मेरी मां को किताबें पढ़ना और गाने सुनना पसंद हैं। लेकिन मैं अपनी मां के लिए एक साथी चाहता हूं।

मुझे लगता है कि पुस्तकें और गीत कभी किसी साथी की जगह नहीं ले सकते। एकाकी जीवन गुजारने की बजाय बेहतर तरीके से जीना ज़रूरी है। मैं आने वाले दिनों में और व्यस्त हो जाऊंगा। शादी होगी, घर-परिवार होगा। लेकिन मेरी मां? हमलोगों को रुपये-पैसे, जमीन या संपत्ति का कोई लालच नहीं हैं। लेकिन भावी वर को आत्मनिर्भर होना होगा। उसे मेरी मां को ठीक से रखना होगा।

मां की खुशी में ही मेरी खुशी है। इसके लिए हो सकता है कि कई लोग मेरी खिल्ली उड़ाएं या किसी को लग सकता है कि मेरा दिमाग खराब हो गया है। ऐसे लोग मुझ पर हंस सकते हैं। लेकिन उससे मेरा फैसला नहीं बदलेगा। मैं अपनी मां को एक नया जीवन देना चाहता हूं। चाहता हूं कि उनको एक नया साथी और मित्र मिले।"

In West Bengal Son seeks self Independent sufficient Groom for his widowed mother On Facebook
गौरव - फोटो : BBC
उनकी इस पोस्ट पर कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं?

गौरव बताते हैं, "इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने फोन कर विवाह की इच्छा जताई है। इनमें डाक्टर और मैरीन इंजीनियर से लेकर शिक्षक तक शामिल हैं। उनमें से किसी योग्य पात्र को तलाश कर मां का दूसरा विवाह कराना ही फिलहाल मेरा प्रमुख लक्ष्य है।"


लेकिन क्या समाज के लोग इस पोस्ट के लिए आपका मजाक नहीं उड़ा रहे हैं?

गौरव का कहना है कि "पीठ पीछे तो लोग लाख तरह की बातें करते हैं। लेकिन अब तक सामने किसी ने कुछ नहीं कहा है। वह कहते हैं, मैंने महज प्रचार पाने के लिए यह पोस्ट नहीं लिखी है। बहुत से युवक-युवतियां मेरी तरह अपने मां-बाप के बारे में जरूर सोचते होंगे। लेकिन समाज के डर से वह लोग आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।"

गौरव को उम्मीद है कि उनकी इस पहल से ऐसे दूसरे लोग भी आगे आएंगे। गौरव जिस बऊबाजार इलाके में रहते हैं उसी मोहल्ले के शुभमय दत्त कहते हैं, "ये एक अच्छी पहल है। कई लोग कम उम्र में ही पति या पत्नी के निधन से अकेले पड़ जाते हैं। रोजी-रोटी की व्यस्तता की वजह से संतान भी उनका वैसा ध्यान नहीं रख पाती। ऐसे में जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत का विचार बुरा नहीं है।"

एक सामाजिक संगठन मानविक वेलफेयर सोसायटी के सदस्य सोमेन भट्टाचार्य कहते हैं, "ये पहल सराहनीय है। लोग तो कुछ न कुछ कहेंगे ही। लेकिन अपनी मां के भविष्य के बारे में एक पुत्र की यह चिंता समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।"

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चंदन नगर - फोटो : BBC
नई नहीं परंपरा

पश्चिम बंगाल में विधवा विवाह की परंपरा नई नहीं हैं। विधावाओं के पुनिर्विवाह के लिए समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने सबसे पहले आवाज उठाई थी। इस साल उनकी दो सौवीं जयंती मनाई जा रही है। उनके प्रयासों की वजह से ही 16 जुलाई, 1856 को देश में विधवा विवाह को कानूनी तौर पर मान्यता मिली थी।

खुद विद्यासागर ने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया था। इस अधिनियम से पहले तक हिंदू समाज में ऊंची जाति की विधवा महिलाओं को दोबारा शादी की इजाजत नहीं थी। अपने इस प्रयास के दौरान विद्यासागर को काफी सामाजिक विरोध झेलना पड़ा था। कट्टरपंथियों ने उनको जान से मारने तक की धमकियां दी थीं। लेकिन वह पीछे नहीं हटे। आखिर में उनका प्रयास रंग लाया।

लेकिन विडंबना यह है कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रयासों से विधवा विवाह को कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल में विधवाओं के पुनर्विवाह की परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई। बनारस से वृंदावन तक तमाम आश्रमों में बंगाल की विधवाओं की बढ़ती तादाद इस बात की पुष्टि करती है।

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चंदन नगर - फोटो : BBC
बंगाल में विधवाओं की हालत देश में सबसे बदतर

राष्ट्रीय महिला आयोग ने कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में पेश अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि सीपीएम की अगुवाई वाली सरकार के शासनकाल के दौरान बंगाल में विधवाओं की हालत देश में सबसे बदतर है। उसी दौर में राज्य की विधवाओं के बनारस और वृंदावन जाने का सिलसिला तेज हुआ।

नाटिंघम विश्वविद्यालय के स्कूल आफ इकोनामिक्स के इंद्रनील दासगुप्ता के साथ विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की नाकामी पर शोध करने वाले कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान के दिगंत मुखर्जी कहते हैं, "ईश्वर चंद्र विद्यासागर की अगुवाई में चले सामाजिक आंदोलन के दबाव में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उक्त अधिनियम को पारित जरूर कर दिया था। लेकिन आगे चल कर समाज में इसका खास असर देखने को नहीं मिला। विधवाओं को समाज में अछूत ही माना जाता रहा।" 

वह कहते हैं कि एकल परिवारो के मौजूदा दौर में विधवाओं की हालत औऱ बदतर हुई है। यही वजह है कि बनारस औऱ वृंदावन के विधवाश्रमों में बंगाल की विधवाओं की तादाद साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।

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