10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ-साथ विभिन्न स्वतंत्र कर्मचारी महासंघों द्वारा बुधवार को आयोजित राष्ट्रव्यापी हड़ताल सफल रही है। इस हड़ताल में केंद्र के अलावा राज्यों के कर्मचारी संगठनों ने भी हिस्सा लिया। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के अध्यक्ष एसएन पाठक और महासचिव सी श्रीकुमार ने बताया, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा की हड़ताल के समर्थन में 400 से अधिक रक्षा प्रतिष्ठानों के 3 लाख रक्षा असैन्य कर्मचारियों ने एक घंटे के लिए विशाल प्रदर्शन कर काम का बहिष्कार किया। रक्षा उद्योग संगठन के पदाधिकारियों ने सरकार को चेतावनी दी है कि कर्मचारियों की मांग नहीं मानी गई तो आंदोलन तेज करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा।
केंद्रीय कर्मचारी संगठन, 'कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स' के महासचिव एसबी यादव ने कहा, सरकार को पुरानी पेंशन बहाली सहित दूसरी मांगें माननी पड़ेंगी। इस हड़ताल के बाद अब कर्मचारी संगठन, आगे की रणनीति पर विचार करेंगे। सरकार ने कर्मियों के हितों की तरफ ध्यान नहीं दिया तो भविष्य में केंद्रीय कर्मचारी संगठन, कोई भी कठोर निर्णय ले सकते हैं।
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विरोध-प्रदर्शन
- फोटो : Amar Ujala
बता दें कि केंद्रीय कर्मचारी संगठन, 'कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स' की तरफ से कैबिनेट सचिव को पहले ही एक दिवसीय हड़ताल का नोटिस दे दिया गया था। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव श्रीकुमार के मुताबिक, देश की केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र महासंघों ने भारतीय मजदूर वर्ग की लंबित मांगों के समर्थन में हड़ताल का आह्वान किया था। केंद्र सरकार, मजदूरों और उनकी ट्रेड यूनियनों की अनदेखी कर रही है। रक्षा कर्मचारियों के अग्रणी और प्रमुख ट्रेड यूनियन अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ और संबद्ध यूनियनों ने देश के मजदूर वर्ग के साथ मिलकर सुबह के समय एक घंटे के लिए काम का बहिष्कार करके हड़ताल का समर्थन किया। चार सौ से अधिक रक्षा प्रतिष्ठानों के सामने विशाल प्रदर्शन किया गया।
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अवादी, कोच्चि, त्रिची, हैदराबाद, जबलपुर, मुंबई, पुणे, कोलकाता, दिल्ली, कानपुर, नागपुर, बालासोर, बंगलूरू जैसे प्रमुख रक्षा केंद्रों और अन्य स्थानों पर हजारों रक्षा असैन्य कर्मचारी, संबंधित रक्षा प्रतिष्ठानों के समक्ष एकत्रित हुए। वर्तमान सरकार द्वारा अपनाई जा रही रक्षा कर्मचारी और सरकारी रक्षा उद्योग विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई गई। आयुध कारखानों के निगमीकरण, विभिन्न स्वीकृत पदों को समाप्त करने, रिक्तियों को न भरने, आउटसोर्सिंग, निजीकरण, चार कर्मचारी-विरोधी श्रम संहिताओं, निश्चित अवधि के रोजगार और पेंशनभोगियों की पुनः नियुक्ति के खिलाफ आवाज उठाई गई।
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श्रीकुमार ने कहा, अंशदायी एनपीएस और यूपीएस को वापस लेने पर जोर दिया गया है। कर्मियों की मांग है कि पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए। अन्य मांगों में मृतक कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करना, आयुध निर्माणी कर्मचारियों का दर्जा उनकी सेवानिवृत्ति तक 7 आयुध निर्माणी निगमों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के रूप में बनाए रखने के लिए अधिसूचना प्रकाशित करना आदि शामिल हैं। एआईडीईएफ ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर सरकार उनकी मांगों का समाधान नहीं करती है, जो उन्होंने कई बार सरकार के समक्ष रखी हैं, तो फेडरेशन के पास आने वाले दिनों में हल्लाबोल करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।
'कॉन्फेडरेशन' के महासचिव एसबी यादव ने कहा, केंद्र सरकार के समक्ष कई मांग रखी गई हैं। इनमें आठवें वेतन आयोग की कमेटी का अविलंब गठन करने और स्टाफ साइड एनसी जेसीएम द्वारा आठवें वेतन आयोग के 'टर्म ऑफ रेफरेंस' के लिए जो सुझाव दिए गए हैं, उन्हें 'रेफरेंस' में शामिल करना, शामिल है। कर्मचारियों के लिए एनपीएस, यूपीएस को खत्म किया जाए। सभी कर्मियों के लिए पुरानी पेंशन बहाल की जाए। कोविड 19 के दौरान डीए/डीआर की जो तीन किस्तें फ्रीज कर दी गई थी, उसे जारी किया जाए। पेंशन के कम्यूटेड हिस्से को 15 साल की बजाय 12 साल के बाद बहाल किया जाए। अनुकंपा नियुक्ति पर लगाई गई 5 प्रतिशत की सीलिंग को हटाया जाए। सभी मामलों में मृतक कर्मचारी के बच्चों/आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति दी जाए। केंद्र सरकार के सभी विभागों में कैडर के रिक्त पदों को भरा जाए। यादव ने कहा, सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग और निगमीकरण की प्रथा पर रोक लगे।
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एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने 41 आयुध कारखानों के निगमीकरण के बाद सरकारी स्वामित्व वाले रक्षा उद्योगों और उनके कर्मचारियों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सरकार व्यवस्थित रूप से सरकारी रक्षा क्षेत्र को कमजोर कर रही है। निगमित आयुध कारखाने जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वित्तीय और गैर-वित्तीय सहायता के तथाकथित आश्वासन केवल कागजों पर ही रह गए हैं। अधिकांश कारखानों को सशस्त्र बलों से पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। इससे कर्मचारी अत्यधिक दबाव और संकट में हैं। निगमीकरण के चार वर्षों के भीतर आयुध कारखानों में कर्मचारियों की संख्या 72,000 से घटकर 63,000 रह गई है। प्रशिक्षित ट्रेड अप्रेंटिस को स्थायी आधार पर भर्ती नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय, उन्हें नौकरी या सामाजिक सुरक्षा के बिना निश्चित अवधि के रोजगार के तहत रखा जाता है, जबकि ऐसी नियुक्तियों का समर्थन करने वाला कोई कानून नहीं है। सरकार ने पिछले चार वर्षों से अनुकंपा नियुक्तियों पर रोक लगा रखी है। मद्रास उच्च न्यायालय में केंद्र द्वारा कर्मचारियों का केंद्र सरकार का दर्जा बनाए रखने और सेवा शर्तों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता पूरी नहीं हुई है। ट्रेड यूनियन अधिकारों में कटौती की जा रही है।