नारद मुनि का नाम आते ही कानों में एक ही शब्द गूंजता है 'नारायण-नारायण'। नारद मुनि जो नारायण के परम भक्त व देवताओं के बीच संवाद तंत्र थे, वह हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माने गए हैं। ब्रह्मांड के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद की जयंती 27 मई को मनाई जाएगी। श्रद्धालु विधि-विधान से देवर्षि नारद की पूजन-अर्चन कर उन्हें प्रसन्न करेंगे। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ माह की प्रतिपदा के दिन भगवान विष्णु भक्त नारद का जन्म हुआ था। ऐसे में इस दिन नारद जयंती मनाई जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, संगीत और वीणा के जनक देव ऋषि नारद का जन्म सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के कंठ से हुआ था। इन्हें तीनों लोकों में वायु मार्ग द्वारा विचरण करने का वरदान प्राप्त है। इस दिन नारदजी की पूजा करने से व्यक्ति को बल और बुद्धि मिलती है। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी कहानी ...
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देवर्षि नारद जयंती: जानिए ब्रह्मांड के पहले 'पत्रकार' की कहानी, ऐसे हुई थी इनकी उत्पत्ति
Wed, 26 May 2021 05:30 PM IST
vivek shukla
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 26 May 2021 05:30 PM IST
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नारद जी।
- फोटो : Social Media
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नारद मुनि।
- फोटो : अमर उजाला।
नारद जयंती की पूजा विधि
पंडित देवेंद्र प्रताप मिश्र के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के बाद देवर्षि नारद की पूजा आराधना करनी चाहिए। नारद जयंती के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प करें, पूजा-अर्चना करें।
पंडित देवेंद्र प्रताप मिश्र के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के बाद देवर्षि नारद की पूजा आराधना करनी चाहिए। नारद जयंती के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प करें, पूजा-अर्चना करें।
भगवान विष्णु (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : Social media
नारदजी को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल अर्पित करें। शाम को पूजा करने के बाद, भक्त भगवान विष्णु की आरती करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें सामर्थ्य अनुसार दान करें।
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नारद मुनि। (सांकेतिक फोटो)
- फोटो : amar ujala
ऐसे हुई थी देवर्षि नारद की उत्पत्ति
पंडित अवधेश मिश्रा ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारदजी पूर्व जन्म में 'उपबर्हण' नाम के गंधर्व थे। उन्हें अपने रूप पर बहुत अभिमान था। एक बार अप्सराएं गंधर्व गीत और नृत्य से ब्रह्मा की आराधना कर रही थीं, तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वहां आए। उपबर्हण का यह अशिष्ट आचरण देख कर ब्रह्मा नाराज हो गए और उन्होंने उसे 'शूद्र योनि' में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
पंडित अवधेश मिश्रा ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारदजी पूर्व जन्म में 'उपबर्हण' नाम के गंधर्व थे। उन्हें अपने रूप पर बहुत अभिमान था। एक बार अप्सराएं गंधर्व गीत और नृत्य से ब्रह्मा की आराधना कर रही थीं, तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वहां आए। उपबर्हण का यह अशिष्ट आचरण देख कर ब्रह्मा नाराज हो गए और उन्होंने उसे 'शूद्र योनि' में जन्म लेने का श्राप दे दिया।
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ब्रह्मा जी।
- फोटो : pinterest
ब्रह्माजी के श्राप फलस्वरूप नारदजी का जन्म 'शूद्रा दासी' के घर पर हुआ। इसके बाद उन्होंने प्रभु की भक्ति आराधना की तो उन्हें एक दिन ईश्वर के दर्शन हुए। इससे उनके मन में ईश्वर और सत्य को जानने की लालसा बढ़ गई। उसी समय आकाशवाणी हुई कि ‘हे बालक, इस जन्म में अब तुम मेरे दर्शन नहीं कर पाओगे। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद होंगे’। इसके बाद इन्होंने भगवान विष्णु की कठिन तपस्या की, जिसके फलस्वरूप ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में वह अवतरित हुए।