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ब्रम्हलीन महंत दिग्विजयनाथ: किराए के कमरे से जलाई थी शिक्षा की ज्योति, विश्वविद्यालय तक पहुंची रोशनी

Thu, 23 Sep 2021 09:45 AM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 23 Sep 2021 09:45 AM IST
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Mahant Digvijaynath struggle story at Gorakhnath Temple of Gorakhpur
दिग्विजयनाथ पार्क की दीवार पर बनाई गई पेंटिंग। - फोटो : अमर उजाला।
वर्ष 1935 से 1969 तक नाथपंथ के विश्वविख्यात गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ ने किराए के कमरे में जो शिक्षा की ज्योति जलाई थी उसकी रोशनी आज विश्वविद्यालय तक पहुंच गई है। महंत दिग्विजयनाथ न केवल गोरखनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप के शिल्पी रहे, बल्कि उनका पूरा जीवन राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा व समाजसेवा के जरिये लोक कल्याण को समर्पित रहा। तरुणाई से ही वह देश की आजादी की लड़ाई में भागीदारी करते रहे, तो देश के आजाद होने के बाद सामाजिक एकता और उत्थान के लिए लड़ाई लड़ी। इसके लिए शैक्षिक जागरण पर उनका सर्वाधिक जोर रहा।


महंत दिग्विजयनाथ का जन्म वर्ष 1894 में वैशाख पूर्णिमा के दिन चित्तौड़, मेवाड़ ठिकाना ककरहवां (राजस्थान) में हुआ था। उनके बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में इनका आगमन गोरखपुर के नाथपीठ में हुआ। अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की माटी की तासीर थी कि बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वाभिमान से समझौता न करने की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी थी। उनकी शिक्षा गोरखपुर में ही हुई और उन्हें खेलों से गहरा लगाव था। 15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह इस पीठ के पीठाधीश्वर बने।
Mahant Digvijaynath struggle story at Gorakhnath Temple of Gorakhpur
दिग्विजयनाथ पार्क की दीवार पर बनाई गई पेंटिंग। - फोटो : अमर उजाला।
देश को स्वतंत्र देखने का उनका जुनून था कि उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समर्थन में स्कूल छोड़ दिया। उन पर लगातार आरोप लगते थे कि वह क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देते हैं। 1922 के चौरीचौरा के घटनाक्रम में भी उनका नाम आया, लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।
 
Mahant Digvijaynath struggle story at Gorakhnath Temple of Gorakhpur
दिग्विजयनाथ पार्क की दीवार पर बनाई गई पेंटिंग। - फोटो : अमर उजाला।
श्रीराम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर हैं महंत दिग्विजयनाथ
अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए हुए आंदोलनों में गोरक्षपीठ की महती भूमिका रही है। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ इस आंदोलन में नींव के पत्थर हैं। 1934 से 1949 तक उन्होंने लगातार अभियान चलाकर आंदोलन को न केवल नई ऊंचाई दी, बल्कि 1949 में वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के नेतृत्वकर्ता भी रहे। पांच सौ वर्षों के इंतजार के बाद 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
 
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Mahant Digvijaynath struggle story at Gorakhnath Temple of Gorakhpur
दिग्विजयनाथ पार्क की दीवार पर बनाई गई पेंटिंग। - फोटो : अमर उजाला।
शिक्षा की जलाई ज्योति से प्रकाशित हो रहा अंचल
महंत दिग्विजयनाथ ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों के लिए शिक्षा की जो ज्योति जलाई, उससे आज पूरा अंचल प्रकाशित हो रहा है। शिक्षा क्रांति के लिए उन्होंने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। एक किराए के मकान में परिषद के तहत महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल शुरू हुआ। 1935 में इसे जूनियर हाईस्कूल की मान्यता मिली और 1936 में हाईस्कूल की पढ़ाई शुरू हुई। अब नाम ‘महाराणा प्रताप हाई स्कूल’ हो गया। इसी बीच महंत दिग्विजयनाथ के प्रयास से गोरखपुर की सिविल लाइंस में पांच एकड़ भूमि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को प्राप्त हो गई। इसके बाद महाराणा प्रताप हाईस्कूल का केंद्र सिविल लाइंस हो गया। देश के आजाद होते समय यह विद्यालय महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
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Mahant Digvijaynath struggle story at Gorakhnath Temple of Gorakhpur
दिग्विजयनाथ पार्क की दीवार पर बनाई गई पेंटिंग। - फोटो : अमर उजाला।
साल 1949-50 में इसी परिसर में महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज की स्थापना महंत दिग्विजयनाथ की अगुवाई में हुई। शिक्षा के संबंध में उनकी सोच दूरदर्शी और निजी हित से परे थी। यही वजह थी कि उन्होंने 1958 में अपनी संस्था महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज को गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दान में दे दिया। बाद में परिषद की तरफ से उनकी स्मृति में दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना की गई। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् द्वारा वर्तमान में करीब चार दर्जन शिक्षण संस्थाएं गोरखपुर क्षेत्र में संचालित हो रही हैं। इनमें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों 28 अगस्त को लोकार्पित महायोगी गुरु गोरखनाथ विश्वविद्यालय सबसे नवीन है।
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