डीडी भारती पर इन दिनों विष्णु पुराण (Vishnu Puran) का प्रसारण किया जा रहा है। विष्णु पुराण में अब तक आपने देखा संजीवनी मंत्र पाने के बाद दैत्य कालकेतु देवलोक पर आक्रमण की घोषणा कर देता है। देवराज इंद्र को युद्ध से भागना पड़ता है। इंद्र अन्य देवताओं के साथ मिलकर भगवान लक्ष्मी नारायण की शरण में जाते हैं। जहां भगवान विष्णु अमृत पाने के लिए देवराज इंद्र को सागर मंथन की सलाह देते हैं।
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विष्णु पुराण
- फोटो : सोशल मीडिया
इंद्र समुद्र मंथन का प्रस्ताव लेकर दैत्यों के पास जाते हैं। दानव राज अपने गुरु शुक्राचार्य की सलाह से ये प्रस्ताव स्वीकार करते हैं। एक तरफ होती है देव सेना तो वहीं दूसरी तरफ दानवों की सेना। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकी को नेती बनाया गया।
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मंथन शुरू होने से पहले दानवों और दैत्यों के बीच समझौता होता है कि समुद्र मंथन से जो भी निकलेगा, वह दोनों पक्षों में बराबर बंटेगा। इस बीच वासुकी नाग के मुख की ओर न रहने के लिए दोनों पक्षों में बहस होती है, कोई भी वासुकी नाग के मुख की तरफ नहीं होना चाहता क्योंकि उनके मुख से निकली अग्नि से भस्म होने का खतरा होता है। इस बीच देवऋषि नारद अपनी चतुराई से दैत्यों को वासुकी नाग के मुख की ओर रहने के लिए मनाते हैं।
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समुद्र मंथन की प्रक्रिया आरंभ होती है किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। इस तरह पृथ्वी के कल्याण के लिए भगवान ने लिया कूर्म अवतार।
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भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदार पर्वत तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन से निकला पहला रत्न। जब देवताओं व दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमें से सबसे पहले भयंकर विष निकला अब आगे क्या होता है ये जानने के लिए आपको अगले एपिसोड का इंतजार करना होगा।