- Movie Review: सेटर्स
- कलाकार: आफताब शिवदासानी, श्रेयस तलपड़े, इशिता दत्ता, पवन मल्होत्रा, सोनाली सहगल, जमील खान, मनु ऋषि और विजय राज
- निर्देशक: अश्विनी चौधरी
- निर्माता: विकास मणि
- रेटिंग: ***
लाडो और धूप जैसी जबर्दस्त फिल्में बनाने वाले निर्देशक अश्विनी चौधरी बीच में 'गुड बॉय बैड बॉय' और 'जोड़ी ब्रेकर्स' जैसी फिल्मों से कमर्शियल सिनेमा के मायाजाल में उलझ भले गए हों, लेकिन अपनी नई फिल्म 'सेटर्स' से उन्होंने रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों की फिल्म बनाने का असली रास्ता फिर से पकड़ लिया है। कॉमेडी फिल्मों के चक्कर में फंसे हिंदी सिनेमा के दो बेहतरीन कलाकारों आफताब शिवदासानी और श्रेयस तलपड़े को अश्विनी ने अपनी फिल्म 'सेटर्स' में बतौर कलाकार नया जीवनदान दिया है।
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दोनों ने ये साबित भी किया है कि अगर निर्माता और निर्देशक उन्हें लेकर कॉमेडी से आगे कुछ नहीं सोच रहे तो इसमें नुकसान सिनेमा का है। 'एवेंजर्स एंडगेम' के हैंगओवर से बाहर निकलने में 'सेटर्स' पूरी तरह कारगर फिल्म है। 'सेटर्स' की कहानी अश्विनी चौधरी ने खुद निर्माता विकास मणि के साथ मिलकर लिखी है। फिल्म परीक्षाओं में नकल कराने वाले माफिया की पूरी कार्यप्रणाली का सनसनीखेज खुलासा करती है।
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बनारस के भैयाजी अपने खास कारिंदे अपूर्वा के जरिए पूरे उत्तर भारत में परीक्षाओं में सेटिंग का नेटवर्क चलाता है। उसकी बेटी अपूर्वा से प्यार करती है और अपने इम्तिहान अपने बूते पास करना चाहती है। अपूर्वा का सहपाठी आदित्य वाराणसी का एसपी है और उसकी पत्नी पहले अपूर्वा की प्रेमिका थी। दोनों के बीच इस खलिश के अलावा गुस्सा साथ साथ पढ़ने के बावजूद एक के अफसर बन जाने और दूसरे के रास्ते पर रह जाने का भी है।
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फिल्म 'सेटर्स' की कहानी के बाद इसका सबसे मजबूत पक्ष है रामेश्वर भगत की एडिटिंग। संतोष थुंडियल की सिनेमैटोग्राफी और भगत की एडिटिंग पहले सीन से ही फिल्म दर्शकों को बाहर की दुनिया भुला देती है और अपने साथ कहानी का हिस्सा बनने को मजबूर कर देती है। फिल्म और डॉक्यू ड्रामा के बीच झूलती इस कहानी में रोमांस के हल्के फुल्के लम्हे भी निर्देशक ने रखे हैं। पूरी फिल्म में आइटम नंबर या जबरदस्ती के गाने डालने के लालच से बचकर अश्विनी ने बड़ा काम किया है।
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अश्विनी फिल्ममेकर के अलावा सोशल एक्टिविस्ट भी हैं। फिल्म में इसकी झलक भी दिखती है। बनारस को सेटर्स का अड्डा दिखाने और अच्छे दिन के नारे पर कमेंट के पीछे उनकी एक्टिविज्म दिखती है। अश्विनी को साधुवाद इसलिए भी बनता है कि वह मसाला फिल्मों से बाहर निकले और वापस अपनी उसी लीक पर लौटे जिसने उनकी हिंदी सिनेमा में एक अलग जगह पक्की की। अदाकारी के मामले में श्रेयस तलपड़े सब पर भारी हैं। इस अभिनेता का परदे पर असली दमखम दिखना अब भी बाकी है। आफताब की बनावटी अकड़ उनकी राह का रोड़ा बनती है। सोनाली सहगल से ज्यादा तालियां फिल्म में इशिता दत्ता को मिलती हैं।