Movie Review: 99 सॉन्ग्स
कहानी, निर्माता और संगीतकार: ए आर रहमान
पटकथा, निर्देशन: विश्वेश कृष्णमूर्ति
कलाकार: इहान भट, इडिलसी वर्गास, रंजीत बारोट, तेनजिन डाल्हा, राहुल राम, लीजा रे और मनीषा कोइराला
रेटिंग: ***
ए आर रहमान जब ‘पटाखा गुड्डी’ बना रहे थे तो उनके दिमाग में साथ साथ फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ की कहानी भी चल रही थी। आलिया भट्ट की मासूमियत उन्हें भा गई थी। आलिया जैसी ही मासूम हीरोइन इडिलसी वर्गास वह डोमिनिकन रिपब्लिक से तलाश लाए हैं। हीरो इहान भट भी लाखों में एक ढूंढने में वह कामयाब रहे। दोनों कमाल के कलाकार हैं। दोनों का हुनर तराशने में रहमान ने जो समय और पैसा बहाया है, उसका संगम यहां फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ में देखने को मिलता है। फिल्म के गानों के हिंदी बोल भले आपको रहमान की पहली फिल्म ‘रोजा’ जैसा अनुभव दिलाते हैं। लेकिन, यहां रहमान सिर्फ संगीतकार के तौर पर मौजूद नहीं हैं, वह फिल्म के निर्माता भी हैं। निर्माता के तौर पर फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ में वह पूरे में पूरे नंबर पाते हैं।
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99 Songs
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रहमान बीती सदी का एक जादू हैं। ऐसा जादू जो संगीत में कभी कभी ही होता है। उन्होंने अपने शुरूआती दिनों में न मदन मोहन का सुना, न एस डी बर्मन को। दक्षिण के तमाम संगीतकारों ने हिंदी फिल्मों की धुनें उठाकर महफिलें लूटी हैं। पर रहमान ओरीजनल रहे। विश्व संगीत की लहरियां जरूर उनके संगीत में दिखती हैं। उस संगीत में जिसे फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ सबसे बड़ा नशा मानती है। फिल्म की कहानी रहमान ने खुद लिखी है। गरीब हीरो, अमीर हीरोइन और बीच में हीरोइन का खड़ूस बाप, वाली ये कहानी देखी देखी सी लगती है। रहमान वैसे भी हिंदी फिल्में देखते कहां हैं। खासियत फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ की ये है कि इसकी पटकथा सरल रेखा के बजाय तिर्यक रेखा पर चलती है। समय में आगे पीछे बहती ये पटकथा ही दर्शक को अंत तक बांधे रखती है।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ’99 सॉन्ग्स’ सबसे ज्यादा अगर किसी बात के लिए प्रभावित करती है तो वह है इसकी मेकिंग। फिल्म बनाने पर रहमान ने पानी की तरह पैसा बहाया है। हर सीन नयनाभिराम है। हर शॉट ऐसे गढ़ा गया है जैसे कि कैनवास पर खिंची कोई पेंटिंग हो। शुरू में वाईएम मूवीज का लोगो ही बता देता है कि इसकी मेकिंग का असर क्या होने वाला है। निर्देशक विश्वेश कृष्णमूर्ति को यहां अपने कल्पना को साकार करने वाले दो हुनरमंद सिनेमैटोग्राफर्स तनय साटम और जेम्स काउले का साथ मिला है। दोनों ने फिल्म की आत्मा को परदे पर जीवंत किया है। फिल्म की तकनीकी टीम का कौशल इसे बड़े परदे पर देखे जाने लायक फिल्म बनाता है। फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइनर अपर्ना रैना की भी यहां इसके लिए तारीफ की जानी चाहिए। फिल्म के संवाद जरूर हिंदी पट्टी की रुचि के नहीं बन पड़े हैं। हुसैन दलाल की बजाय ये काम रहमान को किसी ऐसे शख्स से करवाना चाहिए था जिसे रिश्तों के एहसास की देसी समझ हो।
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ए आर रहमान
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रहमान ने ये फिल्म कुछ कहने के लिए बनाई है, और ये बात आप तभी समझ पाएंगे जब आप ये फिल्म इत्मीनान से देखेंगे। फिल्म में एक दर्जन से ज्यादा गाने हैं लेकिन चूंकि ये कहानी के विकास का हिस्सा हैं, इसलिए इनका नशा धीरे धीरे चढ़ना शुरू होता है। अपने होने वाले ससुर की पार्टी में पियानो बजाता नायक और उन धुनों पर हवा में चित्रकारी करती नायिका..!! फिल्म का ये सबसे अनमोल दृश्य है। फिर नायक के सामने चुनौती भी आती है। चुनौती है 100 गाने बनाने की। और, फिल्म पूछती है कि क्या बस एक गाना जीवन बदल सकता है। वैसे सच पूछें तो 99 का फेर तो अपने यहां द्वापर युग से चला आ रहा है।
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रहमान ने फिल्म से दो नए काबिल सितारे सिनेमा को बख्शे हैं। इहान और इडिलसी दोनों लंबी रेस के कलाकार हैं। दोनों के चेहरे मोहरे अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के हिसाब से भी फिट हैं। अभिनय का हर रस दोनों पूरी ईमानदारी से परदे पर निभाते हैं। सोफिया के किरदार में एडिलिसी बहुत ही मोहक दिखी हैं। और, जय को तो रहमान ने पेश ही किया पूरे ‘रॉकस्टार’ फ्लेवर में हैं। फिल्म के साथ इम्तियाज अली भी जुड़े रहे हैं। उन्हें रहमान को कहानी के मामले में इतना घेरदार ना जाकर कुछ रपटीली कहानी पर काम करने को कहना चाहिए था। फिल्म से कनाडा की बड़ी कंपनी भी जुड़ी है।