Movie Review: लुका
कथा: एनरिको कैसारोसा, जेसी एन्ड्रूयज, सिमोन स्टीफेन्स
पटकथा: जेसी एनड्रूयस, माइक जोन्स
निर्देशक: एनरिको कैसारोसा
आवाजें: जैकब ट्रेम्बले, जैक डिलन ग्रेजर, एमा बर्मन, मार्को बैरिसेली, सैवेरियो रायमोंडो, माया रुडॉल्फ और जिम गैफिगन
ओटीटी: डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: ***1/2
कैलीफोर्निया के एमरीविले स्थित पिक्सार एनीमेशन स्टूडियो के दो साल पहले भ्रमण के दौरान जितने भी दिग्गज निर्देशकों से मुलाकात हुई, सबने अपनी बातों में एक बात पर जोर जरूर दिया कि एनीमेशन की दुनिया इंसानी जज्बात को बयां करने का सबसे सशक्त माध्यम है। ये बातें दोस्ती की हो सकती हैं, रिश्तों की हो सकती हैं, परिवार और समाज की भी हो सकती है। लेकिन, ये सारी बातें सच्ची सी होती हैं और शायद तभी देखने वाले को अच्छी लगती हैं। ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म ‘सोल’ के बाद पिक्सार ने अपनी नई फिल्म ‘लुका’ सीधे ओटीटी पर रिलीज की है। देखने लायक तो ये फिल्म बड़े परदे पर ही है लेकिन अगर आपके पास बड़ा सा स्मार्ट टीवी है और बढ़िया म्यूजिक सिस्टम है तो इस संडे माइक्रोवेव में पॉपकॉर्न भूनकर फुर्सत के दो घंटे बिताने का इससे अच्छा नया सिनेमा और कोई नहीं है।
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लुका
- फोटो : सौजन्य पिक्सार/डिज्नी
फिल्म ‘लुका’ की कहानी कई स्तरों पर आपके दिल और दिमाग को एक साथ सितार के या चाहें तो गिटार भी कह सकते हैं, तारों की तरह छेड़ती चलती है। यह कहानी तो बीते जमाने की है लेकिन आज के जमाने की बातें करती है। दिखावटी जमाने में कुछ भी असल नहीं है। जिसे देखा नहीं उसके बारे में धारणाएं बना लेना। जो सामने है उसकी अच्छाई को ठीक से पहचान न पाना। हर समय एक अनदेखे डर से घिरे रहना और इस चक्कर में जिंदगी जीना ही भूल जाना, हम सब रोज करते हैं। फिल्म ‘लुका’ इसे समंदर के अंदर तैरती दुनिया और धरती पर टहलती दुनिया में बांटकर समझाती है। धरती वाले समंदर वालों को दानव समझते हैं और समंदर वाले धरती वालों से डरे सहमे रहते हैं और फिर ‘लुका’ घरवालों की बातें न मान एक दिन पानी से बाहर आ ही जाता है।
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लुका
- फोटो : सौजन्य पिक्सार/डिज्नी
हो सकता है आपको यहां फिल्म ‘फाइंडिंग नीमो’ की याद आए लेकिन मां-बाप के बताए रास्तों की बजाय अपने रास्ते खुद तलाशने की ये हर पीढ़ी की कहानी है। वक्त बदलता रहता है, नसीहतें बदलती रहती हैं, पर बग़ावत हमेशा जिंदा रहती है। और, दोस्ती भी। इन दिनों दुनिया ‘प्राइड मंथ’ मना रही है। बरसों पहले फिल्म ‘शोले’ के जय औऱ वीरू की दोस्ती में भी समलैंगिकता का इशारा पकड़ लेने वाले कुछ ‘बुद्धिमान’ फिल्म ‘लुका’ को भी इसी कड़ी की फिल्म मानते रहे हैं। कोई किसी की कहानी को कैसे देखता है, ये देखने वाले के नजरिये पर भी निर्भर करता है। बुराई करने वाले अक्सर भी वही लोग होते हैं जो बराबरी नहीं कर सकते। फिल्म ‘लुका’ में दो दोस्त धरती की मस्ती तलाशते तलाशते एक ऐसे कंपटीशन में आ खड़े होते हैं, जिसमें हार जीत से ज्यादा इसमें हिस्सा लेना अहम दिखाई देता है।
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लुका
- फोटो : सौजन्य पिक्सार/डिज्नी
फिल्म ‘लुका’ इस वीकेंड पर कुछ समय परिवार के साथ बिताने का बिल्कुल सही सिनेमा है। डिजनी ने दुनिया भर की कहानियों को एनीमेशन में लाने का जो फैसला किया है, उसकी ये मजबूत कड़ी बनी है। इटली की कहानी में जापान सा एनीमेशन है और निर्देशक एनरिको कैसारोसा ने इसमें पिक्सार की नवीनतम तकनीक की बजाय परंपरागत एनीमेशन का ही अधिक सहारा लिया है। फिल्म में न तो सीन के भीतर सेट किए जाने वाले कैमरे हैं और न ही कोई ऐसा दर्द जो आखिर तक दर्शक को फिल्म के नायक के दर्द से जोड़े रखता है। डिजनी की फिल्मों के इन दोनों फॉर्मूलों से छिटकर बाहर निकली फिल्म ‘लुका’ मस्ती की मस्त कहानी है।
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लुका
- फोटो : सौजन्य पिक्सार/डिज्नी
पिक्सार ने फिल्म ‘लुका’ के निर्देशक को इसे अपने हिसाब से बनाने का मौका देकर अच्छा ही किया है। इसने डिज्नी की फिल्मों में बनती जा रही एकरसता को तोड़ने का भी काम किया है। इस कहानी को रसमयी बनाने में इसके संगीत का भी बड़ा हाथ है। डैन रोमर का बनाया संगीत ही फिल्म को देखते समय दर्शकों को भी घर से निकलकर किसी समंदर किनारे की जगह जाकर उछल कूद करने की प्रेरणा देता रहता है। लेकिन, वैक्सीन के दोनों टीके लगने के बाद भी इतनी हिम्मत करना अभी दूर की कौड़ी है। फिल्म ‘लुका’ की सिनेमैटोग्राफी बेजोड़ है और संपादन चुस्त। करीब पौने दो घंटे की ये फिल्म संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजक फिल्म बन पड़ी है।