Movie Review: द बिग बुल
निर्देशक: कूकी गुलाटी
निर्माता: अजय देवगन, कुमार मंगत पाठक आदि।
पटकथा: अर्जुन धवन, कूकी गुलाटी। संवाद: रितेश शाह
कलाकार: अभिषेक ए बच्चन, सोहम शाह, निकिता दत्ता, महेश मांजरेकर, सौरभ शुक्ला, राम कपूर और इलियाना डि क्रूज आदि।
ओटीटी: डिजनी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: ***
अभिषेक बच्चन पर सुपरस्टार बनने का दबाव न रहा होता तो वह ना जाने कब खुद को एक बढ़िया अभिनेता के तौर पर स्थापित कर चुके होते। नाम में बच्चन जुड़ा तो सबने उनमें कलाकार नहीं सुपरस्टार ही देखा। वह अभिनेता अच्छे हैं बशर्ते निर्देशक को उनके अभिनय की सीमाएं पता हो। वह ड्रामा फिल्मों में बढ़िया काम करते हैं। ‘गुरु’, ‘युवा’, ‘बंटी और बबली’, ‘सरकार’, ‘धूम’ और ‘मनमर्जियां’ जैसी फिल्में उनके अभिनय का एक ऐसा ग्राफ खींचती हैं, जिनमें उनको खुद को एक अभिनेता के तौर पर आगे ले जाने का प्रयास दिखता है। इन फिल्मों के बीच तमाम फ्लॉप फिल्में भी हैं, लेकिन अपनी दूसरी पारी में अभिषेक एक बेहतर अभिनेता दिखने लगे हैं। ‘द बिग बुल’ इसकी एक और बानगी है।
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द बिग बुल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द बिग बुल’ एक मसाला फिल्म नहीं है। यह सीधी रेखा पर चलती फिल्म है, जिसकी कहानी आज के समय में एक पत्रकार के जरिए सुनाने का तरीका इसके निर्देशक कूकी गुलाटी ने अपनाया है। कूकी के लिए ये उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट है और जी जान लगाकर उन्होंने फिल्म बनाई भी अच्छी है। फिल्म इससे कहीं बेहतर हो सकती थी अगर पटकथा में थोड़ी मेहनत और की जाती। साथ ही फिल्म की कास्टिंग भी थोड़ा धीरज धरकर की जाती।
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द बिग बुल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘द बिग बुल’ शेयर बाजार की कहानी हेमंत शाह नाम के एक काल्पनिक किरदार के जरिए कहती है। फिल्म का कालखंड वही है जो वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’ का रहा है। दोनों कहानियों का सूत्र एक ही है। लेकिन, हेमंत शाह जिंदगी के करीब ज्यादा लगता है। उसकी गर्लफ्रेंड का पिता जब छत पर उससे कहता है, ‘लेकिन, एक दलाल, दलाल ही है ना!’ तो उसके चेहरे पर हताशा नहीं झलकती। हेमंत के लिए हर तिरस्कार एक नया आविष्कार है, जीवन के उस जुगाड़ का जिसके जरिए उसे कंपनियों के शेयरों से माल बनाना है। हेमंत शाह जब शुरू में कहता है कि ‘मैंने सोच समझकर निवेश किया है।’ और ‘तुक्के और दांव में फर्क है’ तो लगता है कि एक आम आदमी की मालदार बनने की लालसा उससे ऐसा कहला रही है।
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द बिग बुल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, हेमंत शाह धीरे धीरे अपना इरादा जाहिर होने देता है। उसका भाई उसकी दुनिया में उत्प्रेरक बनकर आता है और उसका काम पूरी क्रिया प्रतिक्रिया में बस उससे आगे नहीं बढ़ने पाता। कूकी गुलाटी ने सीरीज की कास्टिंग में थोड़ी गड़बड़ की है। हो सकता है कि यहां उनकी कम और फिल्म के निर्माताओं की ज्यादा चली हो, लेकिन निकिता दत्ता इस फिल्म में मिसकास्ट हैं। महेश मांजरेकर का रुआब मजदूर लीडर सावंत जैसा नहीं लगता। सौरभ शुक्ला सेबी के चेयरमैन के लिए सही चुनाव नहीं हैं। इलियाना डि क्रूज के किरदार का करंट वैसा सामने नहीं आया है जैसी उम्मीद उनको इस फिल्म में देखकर बंधती है। उनके भीतर का कलाकार अब भी पूरी तरह से बाहर आना बाकी है। हर बार उन्हें देख ‘बर्फी’ से आगे की उम्मीद बंधती है लेकिन हिंदी सिनेमा में उनके निर्देशक वहां तक भी नहीं पहुंच पा रहे।
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द बिग बुल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ये और बात है कि ‘द बिग बुल’ अपनी इन कमियों से भी सहारा पाती है तो वह इसलिए कि ये फिल्म को परफेक्ट फिल्म नहीं होने देतीं। और ऐसा करके कूकी गुलाटी ने इसे हेमंत शाह के आधे अधूरे इंसान के जैसा रहने दिया है। शेयर बाजार के बेसिक्स भी ये फिल्म बहुत आसानी से समझाती चलती है। देश में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले इंसान की कहानी एक साथ दो निर्देशकों ने क्यों कहनी शुरू की, इसे शांत मन से सोचें तो मुझे वह समय याद आता है जब एक बहुत बड़ी कंपनी के मुखिया ने हैंसी क्रोनिए की बायोपिक बनाने की बात मुझसे छेड़ी थी। ये तब की बात है जब हिंदी सिनेमा में बायोपिक सिनेमा का सैलाब नहीं आया था।