निर्माताः प्रकाश झा
निर्देशकः अलंकृता श्रीवास्तव
सितारेः रत्ना पाठक शाह, कोंकणा सेनशर्मा, अहाना कुमारा, प्लाबिता बोरठाकुर, विक्रांत मैसी, सुशांत सिंह
रेटिंग ***
अगर आपको फिल्म फेस्टिवल वाली वैचारिक फिल्में पसंद हैं तो निर्देशक अंलकृता श्रीवास्तव की यह फिल्म देख सकते हैं। फिल्म समाज में हर लिहाज से महिलाओं को पीछे रखने वाली सोच पर सवाल करती है। यहां पर कथित नैतिकताओं पर अंगुली उठाई गई है। ये नैतिकता लादने वाले कौन हैं और वे खुद कितने नैतिक हैं?
भोपाल में यह चार महिलाओं की समानांतर चलने वाली संघर्षपूर्ण कहानियां हैं और अलग-अलग चलते हुए एक सूत्र में बंध जाती हैं। फिल्म की सेक्सुअल टोन कुछ लोगों को नापसंद लग सकती है। कुछ इसे लिपस्टिक-क्रांति का ‘लाल रंग’ मान सकते हैं। सेंसर बोर्ड को इस पर आपत्ति थी।
फिल्म में बुआजी बनीं रत्ना पाठक इरॉटिक साहित्य पढ़ने का शौक रखती हैं और सबसे ज्यादा प्रशंसा बटोर ले जाती हैं। वह इस तनाव भरी फिल्म में दर्शकों को कॉमिक रिलीफ भी देती हैं। तीन बच्चों की मां बनी शीरीन (कोंकणा सेनशर्मा) की कहानी संवेदनाएं जगाने के साथ तरक्की से जुड़े अहम खड़े करती है।
वह बच्चे पैदा करने की मशीन बनने के विरुद्ध जबर्दस्त संघर्ष करती हुई परिवार/समाज में अपनी जगह और आवाज तलाश कर रही है। वहीं लीना (अहाना) आज की उन लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो शादी के सपनों से अलग भी सपने देखती हैं। उन्हें जीना चाहती है।
अपनी इच्छा के विरुद्ध चारदीवारी में बंद और नैतिकता की आड़ में कैद महिलाओं को लेकर कुछ सवाल आपके पास हों तो लिपस्टिक अंडर माई बुर्का उन्हें धार दे सकती है। फिल्म महिलाओं की निजी जिंदगी के साथ उनक दिमाग में भी झांकती है।