नेशनल अवॉर्ड विनर मनोज बाजपेयी आज हिंदी सिनेमा की जानी-मानी हस्ती बन गए हैं। आज मनोज अपना 48वां बर्थडे सेलीब्रेट कर रहे हैं। अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने वाले मनोज बाजपेयी को बॉलीवुड में जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। आइए जानते हैं मनोज कैसे बिहार के छोटे से गांव नरकटियागंज से निकलकर बॉलीवुड के भीखू महात्रे बन गए।
स्टार बनने के बाद भी खेती करते हैं मनोज बाजपेयी, एक्टिंग स्कूल में चार बार हुए थे फेल
मनोज को बचपन से ही एक्टिंग करने का शौक था। शुरुआती पढ़ाई के बाद वो 17 साल की उम्र में ही दिल्ली आ गए थे। यहां आने के बाद उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अप्लाई किया। लेकिन चार बार वो फेल हुए। लेकिन मनोज ने हार नहीं मानी। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वो लगातार थिएटर भी करते रहे।
स्टार बनने के बाद भी खेती करते हैं मनोज बाजपेयी, एक्टिंग स्कूल में चार बार हुए थे फेल
मनोज ने दिल्ली के रामजस कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद पैसा कमाने के लिए उन्होंने 'सलाम बालक ट्रस्ट' में टीचर की नौकरी करना भी शुरू कर दिया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में तो एडमिशन नहीं मिला लेकिन मनोज ने बैरी जॉन की एक्टिंग एकैडमी ज्वॉयन कर ली। साल 1994 में मनोज ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी।
स्टार बनने के बाद भी खेती करते हैं मनोज बाजपेयी, एक्टिंग स्कूल में चार बार हुए थे फेल
फिल्म 'द्रोहकाल' में उन्हें एक मिनट का रोल दिया गया था। इसके बाद उन्हें शेखर कपूर की फिल्म 'बैंडिट क्वीन' में एक डकैत का छोटा सा रोल मिला था। मनोज को 1998 में आई राम गोपल वर्मा की फिल्म 'सत्या' से पहचान मिली। इस फिल्म में मनोज ने भीखू महात्रे का किरदार निभाकर बॉलीवुड में अपने लिए जमीन तैयार कर ली थी।
स्टार बनने के बाद भी खेती करते हैं मनोज बाजपेयी, एक्टिंग स्कूल में चार बार हुए थे फेल
इस फिल्म के लिए मनोज को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवॉर्ड भी मिला था। इसके बाद तो मनोज के पास डायरेक्टर्स की लाइन लगने लगी। मनोज ने एक के बाद एक 'कौन', 'शूल', 'जुबैदा', 'अक्स' और 'रोड' जैसी फिल्मों में बेहतरीन अदाकारी की। फिल्म 'पिंजर' के लिए मनोज को स्पेशल जूरी नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था।