मूवी रिव्यू : हम भी अकेले तुम भी अकेले
लेखक: सूजन फर्नांडीस, हितेश व्यास
निर्देशक: हितेश व्यास
कलाकार: अंशुमान झा, जरीन खान, गुरफतेह पीरजादा, प्रभलीन कौर, जाह्नवी रावत आदि
ओटीटी: डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: *½
इन दिनों ओटीटी पर थोक के भाव रिलीज हो रहीं वेब सीरीज और फिल्मों के बीच कभी कभी किसी फिल्म का पोस्टर ही मन को खुश कर जाता है। पैकेजिंग का जमाना है और निर्देशक हितेश व्यास की फिल्म ‘हम भी अकेले तुम भी अकेले’ का पोस्टर वाकई दिल खुश कर देने वाला है। मुस्कान तब और फैलती है जब पता ये चलता है कि पोस्टर में रोडट्रिप पर खुश दिख रही ‘जोड़ी’ दरअसल अपनी अपनी जोड़ी छोड़कर यहां जुड़ी है। समलैंगिक रिश्तों की कहानियों के नाम पर ओटीटी पर इन दिनों जो कुछ परोसा जा रहा है, उसमें फिल्म ‘हम भी अकेले तुम भी अकेले’ से काफी उम्मीद भी जगी। ये इसके बावजूद कि इसके लीड एक्टर अपने अभिनय करियर के दसवें साल में ही ‘मस्तराम’ पर बीते साल आ गए थे। लेकिन, इन दिनों जिससे जितनी उम्मीद करो, वो उतना ही बेवफा निकलता है।
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हम भी अकेले तुम भी अकेले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अंशुमान झा फिल्म ‘हम भी अकेले तुम भी अकेले’ के निर्माता भी हैं जाहिर है ये फिल्म उन्होंने सिनेमा में अपनी एक खास ब्रांडिंग और अपनी पोजीशन सुधारने के लिए ही बनाई होगी। लेकिन, अंशुमान के चेहरे पर जरूरत से ज्यादा पुता मेकअप उनकी इन कोशिशों पर बड़ा धब्बा लगाता है। उनके किरदार का नाम है, वीर प्रताप रंधावा। चंडीगढ़ में एक लड़की से सगाई के दिन रिश्ता तोड़कर भागा वीर दिल्ली आता है अपने प्रेमी अक्षय के पास जिसकी अपनी गृहस्थी पहले से बसी हुई है। झटका लगता है कि कहीं ‘हिज स्टोरी’ का ही तो एक और संस्करण देखने नहीं बैठ गए। लेकिन, कहानी हिचकोले खाते आगे बढ़ती है। कहानी की दूसरी पटरी पर जरीन खान चल रही हैं। सलमान खान उनको अपनी फिल्म ‘वीर’ में इसलिए लाए थे कि वह ऐश्वर्या राय जैसी दिखती हैं। यहां वह मेरठ की मानसी दुबे बनी हैं। उनको अपनी सहेली निकी से प्यार है और वह भी होने वाली शादी के झंझट से निकल कर दिल्ली पहुंची है। दोनों एक ‘एलजीबीटीक्यू’ पार्टी में मिलते हैं। इसके आगे की कहानी में दोनों हमसफर हैं। दोनों की मंजिल अलग अलग है और इसमें किसी दर्शक को क्यों दिलचस्पी हो सकती है, पिक्चर बनाने वालों को जरूर सोचना चाहिए।
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हम भी अकेले तुम भी अकेले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हितेश व्यास की इस फिल्म में बहुत लोचे हैं। पहला लोचा तो ये है कि इस कहानी पर फिल्म नहीं दो घंटे का नाटक अच्छा होता। अंशुमान झा का हाथ भी उसमें बेहतर है। भले सिनेमा सीखने के लिए उन्होंने बीती सदी के शो मैन रहे सुभाष घई की शागिर्दी की है, लेकिन ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ और ‘कांची’ नाम के जिन स्कूलों में उनकी पढ़ाई हुई, उनका कोर्स ही फ्लॉप निकला। अब अंशुमान की तैयारी शायद कुछ अतरंगी सा करके राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना वाली लाइन में लगने की है। लेकिन, एमएक्स प्लेयर पर ‘मस्तराम’ बन चुके अंशुमान को अपनी ब्रांडिंग नए सिरे से गढ़नी होगी। इस तरह के किरदार सोचने और समझने में कितने ही ‘प्रगतिशील’ दिखते हों लेकिन सिनेमा सामुदायिक मनोरंजन का माध्यम है, मास एंटरटेनमेंट। अपने दर्शकों या कहें कि फैंस का इस समुदाय में कितना प्रतिशत है, इस पर रिसर्च खुद अंशुमान को ही करनी होगी। फिल्म में उनका अभिनय कोई नया रंग इसके अलावा दिखाता नहीं है।
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हम भी अकेले तुम भी अकेले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
गुरफतेह पीरजादा, प्रभलीन कौर और जाह्नवी रावत अपने अपने किरदारों में काफी मेहनत करते दिखते हैं। गुरफतेह के साथ दिक्कत ये है कि उन्होंने खुद को सुपरस्टार पहले से मान लिया है। कैमरे के सामने उनकी देह भाषा भी वैसी ही रहती है। प्रभलीन कौर अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं। उन पर निर्देशकों को निवेश करना चाहिए। जाह्नवी रावत ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है। फिल्म में जरीन खान भी हैं। वही फिल्म की हीरोइन हैं। कोशिश भी वह पूरी करती हैं कि अपने किरदार के साथ न्याय करें। लेकिन, उनकी संवाद अदायगी उन्हें यहां भी चमकने नहीं देती। आइटम नंबर से आगे बढ़ने के लिए संवाद अदायगी किसी भी कलाकार की पहली कसौटी है। और, यहां तो फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी ही इसकी पटकथा और संवाद हैं।
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हम भी अकेले तुम भी अकेले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म अधिकतर रीयल लोकेशन पर ही शूट की गई है। इसकी तकनीकी टीम ने कुछ खास ऐसा किया नहीं है जो फिल्म में कोई वैल्यू एडीशन करता हो। फारूक मिस्त्री की सिनेमैटोग्राफी का एक सेट पैटर्न है। उनके किसी भी सीन की शुरूआत खूबसूरत फ्रेम से होती है। लेकिन फिर कलाकारों के भाव पकड़ने में कैमरा फेल हो जाता है। लॉन्ग और मिड शॉट में ही उनके लेंस अटकते रहते हैं। क्लोज अप लेना या कैमरा किसी चेहरे पर चार्ज करने की बात वह भूल से जाते हैं। निर्देशक की खामी ऐसे ही पकड़ आती है। बुल्ले शाह के ‘बुल्ला की जाणां मैं कौन’ जब बजता है तो इससे अंशुमान का किरदार कनेक्ट नहीं होता। उसे तो पता है कि वह समलैंगिक है तभी तो शादी से भागता है। फिल्म बहुत बोरिंग है। अगर लॉकडाउन के चलते जिंदगी पहले ही अवसादों में जा रही हो तो फिर नेटफ्लिक्स पर ‘द लीजेंड ऑफ टार्जन’ देखना बेहतर होगा।