12 जुलाई, 2002 को एक फिल्म रिलीज हुई जिसका नाम था ‘देवदास’। यह फिल्म 1955 में बनी 'देवदास' की रीमेक थी। 1955 की देवदास को विमल रॉय ने डायरेक्ट किया था। विमल की 'देवदास' में दिलीप कुमार थे और भंसाली वाली में शाहरुख खान नजर आए थे। शाहरुख खान और संजय लीला भंसाली पहली बार साथ काम कर रहे थे। बड़ी दिक्कतों के बाद अपने समय की सबसे महंगी फिल्म बनकर तैयार हो गई थी। फिल्म रिलीज हुई और खूब वाह-वाही लूटी और जबरदस्त कमाई भी हुई। साल 2003 में कांस फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म का प्रीमियर किया गया था। साथ ही ऑस्कर के लिए भी नॉमिनेट हुई थी। इस फिल्म ने बॉलीवुड में इतिहास रच दिया था। यह साल की सबसे बड़ी फिल्मों में शामिल हुई थी। लेकिन आपने कभी ध्यान दिया कि भंसाली को ‘देवदास’ बनाने का आइडिया कहां से आया होगा? चलिए आज हम आपको बताते हैं इस फिल्म से जुड़े कुछ किस्से ...
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देवदास
- फोटो : सोशल मीडिया
भंसाली ने इस फिल्म को बनाने में काफी पैसा खर्च किया था। फिल्म का कुल बजट 50 करोड़ रुपए था। इसमें से 20 करोड़ रुपए तो 6 सेट तैयार करने में ही खत्म हो गए थे। खबरें तो ये भी आई थीं कि जिस समय 'देवदास' की शूटिंग चल रही थी उस समय शादी का सीजन था। तब मुंबई की शादियों में लाइटिंग और डेकोरेशन की कमी पड़ गई थी। क्योंकि सारी लाइटिंग और डेकोरेशन का सामान तो भंसाली ने 'देवदास' के सेट पर लगवा रखा था।
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देवदास
- फोटो : सोशल मीडिया
'देवदास' को रियल बनाने के लिए शाहरुख खान सेट पर थोड़ी सी शराब पी लिया करते थे । फिल्म में जैकी श्रॉफ ने चुन्नीलाल का मुख्य किरदार निभाया था। चुन्नीलाल, देवदास का खास दोस्त था । इस रोल के पीछे भी दिलचस्प कहानी है। जैकी से पहले इस रोल के लिए सैफ अली खान और गोविंदा को अप्रोच किया गया था लेकिन इन दोनों ने ही इसे रिजेक्ट कर दिया था।
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संजय लीला भंसाली
- फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म की कहानी आपको याद होगी कि शाहरुख की अपने पिता से बनती नहीं थी। ऐसा ही कुछ भंसाली के अपने पिता के साथ भी था। भंसाली और उनके पिता की बनती नहीं थी। दरअसल, भंसाली के पिता एक प्रोड्यूसर थे और उनकी फिल्में नहीं चलीं तो उन्हें शराब की लत लग गई। ऐसे में उन्हें अपने बीवी-बच्चों का ध्यान नहीं रहता था। बाद में उन्हें लीवर संबंधी गंभीर बीमारी हो गई और अपने आखिरी दिनों में उनके पिता ने अपनी पत्नी लीला की ओर हाथ बढ़ाया। जैसे ही लीला ने हाथ बढ़ाया उन्होंने दम तोड़ दिया।
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देवदास में शाहरुख खान
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बस उस दिन संजय के दिल पर गहरी चोट लगी थी। बाद में उन्होंने ऐसी ही फिल्म बनाने का सोचा। उन्होंने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास’ पढ़नी शुरू की और उन्हें वो एलीमेंट मिल गया। इस फिल्म के आखिर में देवदास पारों के दर पर जाकर ही दम तोड़ता है और धुंधली आंखों से उसे पारों दौड़कर अपनी ओर आती नजर आती है। ऐसा ही कुछ संजय ने असल जिंदगी में देखा था। फिल्म में संजय ने अपने बहुत सारे पर्सनल एक्सपीरियंस को इस्तेमाल किया था।