आग का दरिया है और नाचते-गाते, रूठते-मनाते, हंसते-हंसाते, उम्र को छिपाते, अभिनय पर जमते, कभी विवादों से उखड़ते पार उतरना होता है। कोई चार दशक से मैदान में हैं, तो कोई दो दशक से। बॉलीवुड में उन्होंने कितने बसंत देखे और कितनी बार पतझड़ को महसूस किया, इसका सटीक लेखा-जोखा तो बॉक्स ऑफिस के पास होता है, लेकिन दर्शकों का प्यार भी मायने रखता है।
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dilip kumar, raj kapoor
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कभी तीन सितारे चमकते थे- दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद। ढेर सारी सफल फिल्में और असफलताएं भी कम नहीं लेकिन तब शायद दर्शकों का प्यार कुछ अलग किस्म का था। फिल्में चलें तो ठीक। न चले तो भी प्यार प्यार ही रहता था। इस तिकड़ी के बाद भी ढेर सारे सितारे आए। धूम मची।
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rajesh khanna
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फिल्मों के हिट होने या फ्लॉप होने पर सितारों की कहानियां भी बदलती गईं। असली स्टारडम शुरू हुआ राजेश खन्ना के उदय से। 6 फिल्मों में हल्की-फुल्की चर्चा के बाद जब 'आराधना' आई तो सिनेमा का नया दौर शुरू हो चुका था। लगातार एक के बाद एक हिट। 1966 में उनकी 'आखिरी खत' आई थी और लगभग 1975 तक हिंदी सिनेमा का बॉक्स ऑफिस उन्हीं के नाम से शुरू होता था।
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Amitabh Bachchan, Rajesh Khanna
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2012 तक उनकी फिल्में आती रहीं, लेकिन राजनीतिक सक्रियता और कुछ कारणों से बॉक्स ऑफिस पर वह दमदार नहीं रहे। उन कुछ कारणों में एक कारण था, अमिताभ बच्चन का कद। अमिताभ बच्चन 1969 में 'सात हिंदुस्तानी' के साथ फिल्मों में आए थे। वह राजेश खन्ना के साथ 'आनंद' और 'नमक हराम' में नजर आए लेकिन 'जंजीर' के बाद उनकी मौजूदगी का मतलब बदल गया। वे जहां खड़े हो जाते, लाइन वहीं से शुरू होती। आज भी हालात बदले नहीं हैं। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने सफलता का जो दौर देखा वो और किसी के लिए संभव नहीं हो पाया। फिर खान तिकड़ी की चर्चा होने लगी।
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Aamir Khan Shah rukh Khan and Salman Khan
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आमिर-शाहरुख-सलमान। 1990 से लेकर अब तक इसी तिकड़ी का बॉलीवुड पर जलवा रहा। इस तिकड़ी से अलग गोविंदा, अजय देवगन, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और सैफ अली खान भी 90 के दशक के प्रमुख अभिनेता में शामिल रहे, लेकिन 2000 आते-आते अक्षय कुमार, अजय देवगन और सैफ अली खान ही खुद को बॉलीवुड में प्रासंगिक रख सके। गोविंदा पहले राजनीति में गए और राजनीति से लौटने के बाद उन्होंने कुछ फिल्में कीं लेकिन ‘पार्टनर’ को छोड़कर उनकी एक भी फिल्म हिट की दहलीज पर नहीं पहुंच सकी।