मशहूर शायर और फिल्मी दुनिया के गीतकार कैफी आजमी को चाहने वाले 'रूमानियत का शायर' कहते थे। उनके अनेक किस्से हैं जब उन्हें सुनने वाले पहली बार में ही उन्हें अपना दिल दे बैठते थे। ऐसा ही एक किस्सा उनके बारे में उनके समकालीन शायर निदा फाजली ने साझा किया था। आज कैफी आजमी की पुण्यतिथि पर ये खास पेशकश...
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शायरी और इसकी अदायगी, ये दोनों विशेषताएं किसी एक शायर में मुश्किल से ही मिलती है। और जब ये मिलती है तो शायर अपने जीवन काल में ही लोकप्रियता के शिखर को छूने लगता है। कैफी आजमी इसी परंपरा से जुड़े शायर थे, यह परंपरा उन्हें बचपन में मोहर्रम की उन मजलिसों से मिली थी, जिनमें मर्सिए (शोक-गीत) सुनाए जाते थे।
सुनाने वाले आंखों और हाथों के हाव-भाव और आवाज के उतार-चढ़ाव से सुनने वालों को जब चाहे हंसाते थे, जब चाहे रुलाते थे और कभी उनसे मातम करवाते थे। कैफी आजमी का पढ़ने का अंदाज अपने-अपने समकालीनों में सबसे अनोखा था। मैंने हिंदी के सुमन और भवानी भाई को भी सुना है और उर्दू के फिराक और जोश को भी।
ये सारे अपने अपने अंदाज में महफिलों में छा जाते थे लेकिन कैफी आजमी जब कलाम पढ़ने के लिए बुलाए जाते तो पढ़ने के बाद पूरे मुशायरे को अपने साथ ले जाते थे। हैदराबाद में एक मुशायरे में उनकी इसी कलात्मक प्रस्तुति ने कैफी के जवानी के दिनों की एक लड़की को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने पर मजबूर कर दिया था। कैफी अपनी मशहूर नज्म 'औरत' सुना रहे थे...
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्क फिशानी ही नहीं
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान...
और वह लड़की अपनी सहेलियों में बैठी कह रही थी, “कैसा बदतमीज शायर है, वह ‘उठ’ कह रहा है। उठिए नहीं कहता और इसे तो अदब-आदाब की अलिफ-बे ही नहीं आती। इसके साथ कौन उठकर जाने को तैयार होगा?” मुंह बनाते हुए वह व्यंग्य से पंक्ति दोहराती है, ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे..’ ।
मगर जब श्रोताओं की तालियों के शोर के साथ नज्म खत्म होती है तो वह लड़की अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला ले चुकी थी। मां-बाप ने लाख समझाया वह नहीं मानी। सहेलियों ने इस रिश्ते की ऊंच-नीच के बारे में भी बताया। वह शायर है, शादी के लिए सिर्फ शायरी काफी नहीं होती। शायरी के अलावा घर की जरूरत होती है।
वह खुद बेघर है, खाने-पीने और कपड़ों की भी जरूरत होती है। कम्युनिस्ट पार्टी उसे केवल 40 रुपए महीना देती है। लेकिन वह लड़की अपने फैसले पर अटल रही। और कुछ ही दिनों में अपने पिता को मजबूर करके बंबई (मुंबई) ले आई। सज्जाद जहीर के घर में कहानीकार इस्मत चुगताई, फिल्म निर्देशक शाहिद लतीफ, शायर अली सरदार जाफरी, अंग्रेजी के लेखक मुल्कराज आनंद की मौजूदगी में वह रिश्ता जो हैदराबाद में मुशायरे में शुरू हुआ था, पति-पत्नी के रिश्ते में बदल गया।
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