31 साल पहले मिथुन चक्रवर्ती के जन्मदिन के तोहफे के तौर पर रिलीज हुई फिल्म दाना पानी हिंदी सिनेमा के इतिहास का वह मील का पत्थर है जिसके बारे में कम ही लिखा गया। दाना पानी ही क्यों सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक के मुख्यधारा सिनेमा के बारे में उस समय के सक्रिय फिल्म समीक्षकों ने कुछ खास हिंदी में लिखा नहीं है। हिंदी सिनेमा के निर्माण और इसके सितारों पर जितनी किताबें अंग्रेजी में लिखी गई हैं, हिंदी में उनके आगे लिखी किताबें छटांक भर भी नहीं हैं।
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मिथुन चक्रवर्ती
- फोटो : सोशल मीडिया
समस्या हिंदी सिनेमा की ये भी है कि ये कमाई तो हिंदी में बोलने वाले लाखों करोड़ों मध्यमवर्ग के लोगों की जेबें ढीली करके करता है, लेकिन इसका सारा काम एलीट क्लास वाली अंग्रेजी में होता है। मिथुन चक्रवर्ती इस मामले में हिंदी सिनेमा के पहले सितारे माने जाते हैं जिन्होंने आठवें दशक के मध्य में आकर हिंदी सिनेमा के इस एलीट क्लास के लिए दिक्कतें खड़ी कर दीं। जो फिल्म निर्माता और निर्देशक मिथुन को अपने दफ्तर तक में घुसने नही देते थे, वे निर्माता कुछ साल बाद उनके घर के आगे गाड़ियों में उनसे मिलने का इंतजार करते दिखते थे। मिथुन की फिल्म दाना पानी उनकी दोस्ती का नमूना है और उस जुबान का भी जिस पर जमाना अब भी एतबार करता है।
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दाना पानी
- फोटो : सोशल मीडिया
मिथुन चक्रवर्ती के नाम पर फिल्में बिकने का सिलसिला तो सुरक्षा से ही शुरू हो गया था और हम पांच व वारदात जैसी फिल्मों के जरिए मिथुन ने अपना एक अलग प्रशंसक वर्ग भी तैयार कर लिया था। मिथुन का प्रशंसक वर्ग अधिकतर वह सिनेमा दर्शक रहा जो दाना पानी की तलाश में ही बड़े शहरों में आया। ये सामाजिक और आर्थिक बदलाव का समय था। एक तरफ जहां समाज का एंग्री यंग मैन एलीट क्लास की आंखों में आंखें डालकर अपने साथ हुए हर अन्याय का बदला लेने को तैयार दिख रहा था, दूसरी तरफ एक जिम्मी भी अपनी जान जोखिम में डालकर समाज के बनाए बंधनों को तोड़ने की कोशिश में लगा था।
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मिथुन चक्रवर्ती, अमिताभ बच्चन
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जिम्मी का गुस्सा अपने परिवार को हर कदम पर बेइज्जत किए जाने का था। उसका संघर्ष निजी न होकर सामाजिक था और इसलिए एंग्री यंग मैन पर कई बार भारी पड़ा। ये वह हीरो था जो सेट पर खुद को सर कहे जाने के खिलाफ था। अमिताभ बच्चन के रिश्ते अपने साथी कलाकारों से इसी दौर में इसलिए खराब हुए क्योंकि वह सेट पर सर कहकर बुलाए जाने के पक्षधर थे और मिथुन को कोई सर बोले तो वह नाराज हो जाते थे, तो छोटे बड़े हर कलाकार, तकनीशियन और सेट पर काम करने वाले मजदूर ने उनको बोलना शुरू किया मिथुन दा।
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मिथुन चक्रवर्ती
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डिस्को डांसर से रोड साइड रोमियोज के दिल में बस चुके मिथुन चक्रवर्ती को घरों में एंट्री मिली फिल्म प्यार झुकता नहीं से। ये वो फिल्म थी जिसका जिक्र दो तीन अदालतों ने अपने फैसलों में किया और तलाक की अर्जी लगाने वालों से कहा कि पहले जाकर वो ये फिल्म देखें और तब भी बात न बनें तो वापस अदालत आएं। ये बात अदालतों की कार्यवाही में दर्ज है कि फिल्म प्यार झुकता नहीं देखने के बाद तमाम जोड़ों ने अपनी तलाक की दरख्वास्तें वापस ले ली थीं। प्यार झुकता नहीं फिल्म ने मिथुन को एक सामाजिक नायक की पहचान दी। इसी साल रिलीज हुई फिल्म प्यारी बहना ने मिथुन की इस पहचान को और पुख्ता किया। फिल्म प्यारी बहना के निर्देशक थे बापू, जिन्होंने मिथुन को हम पांच में भीमा बनाया था और बाद में फिल्म प्रेम प्रतिज्ञा में भी मिथुन का करियर चमकाया था।