सेलेब्रिटी कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का कहना है कि सोशल मीडिया पर समय बिताकर अभिनेता या अभिनेत्री बनने की चाह रखने वालों के लिए बड़े परदे पर कोई जगह नहीं है। अभिनेता को अपने हुनर को मांजने का प्रयास करना चाहिए। सोशल मीडिया की रील्स से कोई सच्चा फिल्म निर्देशक प्रभावित नहीं होता। मुंबई में सुबह से होती रही मूसलाधार बारिश भी कला के दीवानों के बीच बेहद लोकप्रिय हो चुके ‘अपना अड्डा’ की महफिल को इस बार सजने से न रोक सकी। दूर दूर से लोग वर्सोवा, अंधेरी के आराम नगर स्थित मुकेश छाबड़ा कास्टिंग कंपनी परिसर पहुंचे और न सिर्फ यहां होने वाली प्रस्तुतियों का भरपूर आनंद लिया बल्कि एक दूसरे के साथ अपने काम, अपने परिवार और अपने गांव-घर के सुख दुख भी बांटे।
Apna Adda July 2024: ‘मिट्टी और पानी भी हमको नाप के मिलते हैं, तुम गमले में पलने को आसान समझते हो !’
‘अपना अड्डा’ की ये शाम कविता पाठ, स्टैंड अप कॉमेडी, एकल अभिनय, गीत और संगीत से सराबोर रही। पुणे से आए मशहूर शायर व गीतकार विशाल बाग ने इस मौके पर अपने चुनिंदा शेर सुनाए और अपनी पुस्तक ‘वीराने तक जाना है’ की कई रचनाएं प्रस्तुत कीं। मुंबई शहर के छोटे छोटे कमरों में रहने वालों की स्थिति बयां करते हुए विशाल ने पढ़ा, ‘मिट्टी और पानी भी हमको नाप के मिलते हैं, तुम गमले में पलने को आसान समझते हो!’ विशाल के इतना पढ़ते ही पूरी महफिल तालियों से गूंज उठी और उसके बाद तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में एक के बाद एक कई रचनाएं पढ़ीं। और, जब उन्होंने पढ़ा, ‘तेरा इकरार मुझे सिर्फ तेरा कर देता, तेरे इन्कार ने तो मांग बढ़ाई मेरी’, तो लोग ‘वाह’ और ‘आह’ एक साथ कर उठे।
जिंदगी के चूल्हे पर
लम्हों की आग जलाएं
चलो, इश्क़ की चाय बनाएं।
मीठी बातों की शक्कर
ताज़ा ख्यालों की पत्ती
अरमानों का पानी खौलाएं,
चलो, इश्क़ की चाय बनाएं।
इश्क़ तेरा अजमत है
इबादतों की मसर्रतें है तू
खुदा तू खुद है मेरे लिए
कलमा, नमाज, अजान सब तू है मेरे लिए।
अभिनेता मनु कृष्णा ने भी पहली बार ‘अपना अड्डा’ मंच पर ही कविता पाठ किया। उन्होंने पढ़ा,
बागी हूं,
बागी पथ पर ही चलना चाहूंगा,
ज्ञात मुझे लथ है पथ ये फिर भी जलना चाहूंगा,
बागी हूं, बागी पथ पर ही..
कार्यक्रम का सबसे भावुक पल तब आया जब चर्चित अभिनेता आलोक पांडे ने अपनी पुस्तक ‘बिचौलिए शहर’ का एक अंश पढ़ा। ये पुस्तक आलोक ने अपने पिता की स्मृतियों को सहेजने के लिए लिखी है। आलोक ने पढ़ा, “जब मैं गांव से जाता था जैसे-जैसे ट्रेन गांव से दूर निकलती जाती थी, आप चुपके चुपके रोते थे आपने कभी सामने से नहीं दिखाया। पापा, सुनो ना पापा, भगवान से कुछ सेटिंग करके, एक उधर से वीडियो कॉल करवा लो ना प्लीज, पापा प्लीज। मुझे कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है कि मैं आपको मुंबई पहले क्यों नहीं ले गया, आप हमेशा मजाक मजाक में बोलते थे, समंदर कब दिखाओगे और मैं हमेशा यह कह देता पापा बस जल्दी ही, अपना घर ले लूं। भले ही छोटा हो लेकिन इसकी बालकनी से समंदर दिखता हो और आपके हाथ में मेरे हाथों से बनाई हुई अदरक वाली स्ट्रांग चाय का बड़ा वाला गिलास हो, ना वो बालकनी आ पाई और ना आप। कहानी अधूरी रह गई पापा…।”