कोलकाता में हुए भोजपुरी सिनेमा स्क्रीन एंड स्टेज अवार्ड्स 2023 में हीरो खेसारी लाल यादव को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का खिताब हासिल हुआ। कभी दिल्ली के फुटपाथों पर लिट्टी चोखा बेचने वाले खेसारी का असली नाम शत्रुघ्न यादव है। पिता सेक्योरिटी गार्ड का काम करते थे और उन्हीं के साथ रहकर खेसारी ने जीवन के संघर्षों से अपना नाता बचपन से ही बना लिया। कमाल का झाल बजाने वाले खेसारी लाल यादव हिंदी सिनेमा के हीरो नंबर वन रहे गोविंदा को अपना भगवान मानते हैं। ‘अमर उजाला’ से इस खास मुलाकात में खेसारी लाल यादव ने अपनी जिंदगी से जुड़े तमाम अनुभव साझा किए हैं।
Best Actor Khesari Lal: ‘दिल्ली में फुटपाथों पर बेचा लिट्टी चोखा, पवन सिंह के मैं अब भी पैर छूता हूं’
छपरा से दिल्ली आने और फिर मुंबई पहुंचकर भोजपुरी सिनेमा में छा जाने की अब तक की यात्रा याद कैसी रही?
मेरे पिताजी दिल्ली में चना बेचते थे और रात में सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे। मैं भी उनकी देखादेखी दिल्ली चला आया। मैंने दिल्ली के फुटपाथों पर लिट्टी चोखा बेचा है। लोगों की प्लेट धोई हैं। उसी से जो कमाई होती थी, उससे मैंने दो तीन एलबम भी निकाले लेकिन सब फ्लॉप हो गए। मैंने कभी संगीत सीखा नहीं। हमारे गांव में जब लोग रामायण गाते थे तो उन्हीं के पीछे मैं झाल बजाया करता था, संगीत से मेरा पहला नाता वहीं से बना।
और, शत्रुघ्न यादव से खेसारी लाल यादव बनने की क्या कहानी है?
संगीत कार्यक्रमों में झाल बजाने के एक रात के मुझे 10 रुपये मिलते थे। उस समय मैं सात आठ साल का था और बाते बहुत करता था। ज्यादा बोलने की वजह से मेरे टीम ने मेरा नाम खेसारी रख दिया था। अब तो घर में भी मुझे कोई शत्रुघ्न के नाम से नहीं बुलाता। मेरे गांव के लोग भी मेरे असली नाम को नहीं जानते। ये खुशनसीबी है कि खेसारी नाम जो दुनिया ने दिया, उसे पूरी दुनिया ने अपना लिया।
संगीत ही आपको नृत्य की तरफ लेकर आया?
गांव में हम लोग शक्ति पूजा करते थे। इतने पैसे तो होते नहीं थे कि आर्केस्ट्रा बुला लें तो खुद ही मंडली बनाकर सब करते थे। हमारे यहां का गुड़ायू नाच बहुत मशहूर है, इसमें लड़के ही लड़की बनकर नाचते हैं। मुझे प्रेरणा वहीं से मिली। मैं गोविंदजी का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। उनको देखकर ही एकलव्य की तरह कुछ कुछ सीखने की कोशिश की। मैं उनकी फिल्मों का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं।
और अब तो आप गोविंदा के साथ मंच पर नाच भी लिए..
कोलकाता में हुए फिल्म समारोह में मैं ही मैं पहली बार गोविंदा जी से मिला। अचानक आपके सामने भगवान आ जाएं तो जैसा असर होगा, वैसा ही कुछ मैं भी स्तब्ध सा रह गया। मुझे लग रहा था कि मंच पर वह अपनी प्रस्तुति देकर चले जाएंगे फिर मेरा नंबर आएगा। मुझे नहीं पता था कि वह मेरे ही साथ नाचने लगेंगे। मेरी ही एक फिल्म ‘लिट्टी चोखा’ का गाना है, ‘क से कमाइब, ख से खियाइब, ग से गोडवा भी दबाइब हो’। इस गाने पर मैंने अपने भगवान गोविंदा के साथ मंच पर प्रस्तुति दी। गोविंदा ने जो काम किया है, वैसा काम कभी हम लोग भी कर पाए तो बस यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।