अगले शुक्रवार निर्माता करण जौहर तेलुगू सिनेमा के हीरो विजय देवरकोंडा को अपनी पहली अखिल भारतीय फिल्म ‘लाइगर’ से हिंदी सिनेमा में पेश करने जा रहे हैं। तेलुगू और हिंदी में बनी ये फिल्म कन्नड़, मलयालम और तमिल में भी रिलीज हो रही है। विजय देवरकोंडा साउथ के बड़े सितारे हैं। उनको पहले पहल हिंदी पट्टी के लोगों ने फिल्म ‘कबीर सिंह’ की चर्चाओं के बीच जाना और जिस तेलुगू फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की ये रीमेक थी, उसे भी ओटीटी पर खूब देखा। फिल्म ‘लाइगर’ के ट्रेलर लॉन्च में हवाई चप्पल पहनने की रणनीति से लेकर अभिनेताओं के कुछ भी न पहनकर फोटो खिंचाने तक के सवालों पर विजय देवरकोंडा ने ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से खुलकर बातचीत की।
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विजय देवरकोंडा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘लाइगर’ में आपका किरदार चाय के ठेले से लेकर बॉक्सिंग रिंग तक का सफर तय करता दिखता है, इस किरदार के लिए अपना शरीर सौष्ठव बनाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी?
बहुत कोशिश करनी पड़ती है ऐसा कुछ करने के लिए। अनुशासित रहना होता है। सामाजिक जीवन से दूरी बनानी होती हैं। दोस्तों से मिलना बंद करना होता है। बाहर जाकर खाना बंद करना पड़ता है और कहीं बाहर जाओ तो अपना टिफिन साथ में लेकर जाना होता है। इस किरदार की तैयारी शुरू करते समय मैंने अपने बेडरूम में एक बड़ा सा बोर्ड टांगा जिस पर पूरे महीने की तारीखें लिखी थीं। जिस दिन मैं अच्छे से कसरत करता था, प्रशिक्षण लेता था, कायदे से खाना खाता था, उस दिन में उस पर पास लिखता था और जिन दिनों में ऐसा नहीं कर पाता था, उस पर फेल लिखता था। ये सिलसिला महीने दर महीने चलता रहा।
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विजय देवरकोंडा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, औसतन महीने में कैसा स्कोर रहा?
औसत निकालने जाएं तो मेरा औसत ठीक रहा। महीने के दो, पांच दिन फेल रहा। हर रोज सोकर मैं उठता था तो ये बोर्ड देखता था और अगर एक दिन भी मैं खुद को अपने प्रयास में विफल पाता था तो अंदर ही अंदर खुद को दोषी मानता था। महीनों गुजर गए ऐसा करते करते। अब शीशे में खुद को देखता हूं तो अलग ही बंदा दिखता है।
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विजय देवरकोंडा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
विजय देवरकोंडा का नाम हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने पहले पहल फिल्म ‘कबीर सिंह’ के समय सुना कि ये आपकी फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ का रीमेक है। सफलता मिलने के बाद उसे और बेहतर करने का दबाव कितना बढ़ जाता है?
असली मजा इसी दबाव में आता है। सच पूछें तो ‘अर्जुन रेड्डी’ का नाम सुन सुनकर मैं बोर हो चुका हूं। अब मुझे कोई अर्जुन के नाम से बुलाता है तो मैं सोचता हूं कि चार साल हो गए इस फिल्म को किए हुए और मेरी दूसरी नई पहचान नहीं बनी। मतलब कि मैंने इस बीच कुछ नहीं किया कि मेरे प्रशंसक अब भी मुझे उसी नाम से बुला रहे हैं।
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विजय देवरकोंडा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, फिल्म ‘लाइगर’ के ट्रेलर लॉन्च में आपका चप्पल पहनकर पहुंचना भी खबर बन गया? ये गेटअप आपने तयशुदा रणनीति के तहत बनाया कि बस उस समय ऐसा हो गया?
अपने आप तो कुछ नहीं होता। ये सब इरादतन की करना पड़ता है। मैं बस ये मानता हूं कि मैं जो पहनूं, वो सहज होना चाहिए। तो अंदर से एक भाव आता है कि ये पहनो और मैं वही पहन लेता हूं। उस दिन का, उस समय का जो भाव है, वही पहनता हूं। हम कलाकार हैं। हम कुछ भी पहन सकते हैं।