पीढ़ियां बदल जाती हैं, पर यादों की चमक बरकरार रहती है। ऐसी ही एक याद आज की तारीख 13 फरवरी भी समेटे हुए है। यह दिन 'वर्ल्ड रेडियो डे' (World Radio Day) के नाम से जाना जाता है। भारत में जब भी रेडियो की बात होती है, सबसे पहले नाम ऑल इंडिया रेडियो (All India Radio - AIR) का आता है। याद आती है ऑल इंडिया रेडियो की वो धुन, जिसके बिना कभी हमारी सुबह की शुरुआत नहीं हुआ करती थी। जो सुबह की पहली किरण के साथ रेडियो पर बजती थी।
World Radio Day: हिटलर के नरसंहार से निकली थी ऑल इंडिया रेडियो की ख्यात धुन
जितनी वो धुन खास थी, उतनी ही उसकी कहानी। आखिर कहां से आई थी वो धुन? किसने बनाई थी? हिटलर के नरसंहार से उस धुन का क्या नाता है? इन सभी सवालों के जबाव आपको आगे की स्लाइड में पढ़ने के लिए मिलेंगे? साथ ही आगे आपको वो धुन सुनने के लिए भी मिलेगी।
करोड़ों लोग इस धुन को पहचानते होंगे, लेकिन कुछ ही लोगों को ही पता है कि ये धुन किसी भारतीय ने नहीं बनाई थी। जर्मनी में हिटलर द्वारा किए गए यहूदियों के नरसंहार से इसकी कहानी शुरू होती है।
एक यहूदी शरणार्थी ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए ये धुन बनाई थी। उनका नाम था - वॉल्टर कॉफमैन (Walter Kaufmann)। राग शिवारंजिनी पर आधारित, तम्बूरे के पीछे लयबद्ध वायलिन के स्वर आज भी ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की यादें ताजा कर देते हैं।
कौन थे वाल्टर कॉफमैन?
- वॉल्टर कॉफमैन का जन्म 1907 में कार्ल्सबाद (कार्लोवी वारी) में हुआ था। उनके पिता का नाम जूलियस कॉफमैन था जो कि एक यहूदी थे। लेकिन उनकी मां यहूदी नहीं थीं, उन्होंने धर्म-परिवर्तन किया था।
- चेक बॉर्डर पर वॉल्टर के पिता की मौत नाजियों से खुद का बचाव करते हुए हुई थी। ये वो दौर था जब यहूदियों पर नाजियों का राज था।
- साल 1934 में हिटलर ने प्राग पर आक्रमण किया। उस वक्त वॉल्टर कॉफमैन की उम्र 27 वर्ष थी।
- हिटलर द्वारा आक्रमण किए जाने के कारण कॉफमैन शरणार्थी बनकर भारत आ गए। यहां मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में शरण ली।
- भारत में शरणार्थी बनकर आए वॉल्टर की योजना यहां बसने की नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन के 14 साल यहां बिताए।
- वॉल्टर की संगीत में रूचि थी और वे एक प्रशिक्षित संगीतकार थे। इसलिए उन्होंने इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के बारे में सोचा।
- भारत आने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने ‘बॉम्बे चैम्बर म्यूजिक सोसाइटी’ बनाई, जो हर गुरूवार विलिंग्डन जिमखाना में कार्यक्रम पेश करती थी।
- भारत से उन्होंने अपने परिवार को कई खत लिखे थे। उन खतों से पता चलता है कि वे बॉम्बे में वॉर्डन रोड (अब भुलाभाई देसाई रोड) के महालक्ष्मी मंदिर के पास एक दो मंजिला घर, ‘रीवा हाउस’ में रहते थे।
- साल 1936 से 1946 तक वॉल्टर ने आकाशवाणी में संगीतकार के तौर में काम किया। महली मेहता, जो ऑर्केस्ट्रा के संचालक थे, उनके साथ मिलकर उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए सिग्नेचर धुन तैयार की जो लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुई और आज भी करोड़ों लोगों की यादों में बसी है।
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