सितंबर महीने की पांचवीं तारीख पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाई जाती है। लेकिन ये दिन भारत के इतिहास में और भी महत्व रखता है। यही वो तारीख है जब भारत की एक बेटी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान का धरती पर बहादुरी दिखाई थी। इंसानियत को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। भारत की उस बहादुरी बेटी का नाम है - नीरजा भनोट।
आज नीरजा की शहादत को 33 साल बीत चुके हैं। उनकी पुण्य तिथि पर हम आपको नीरजा की कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं जो हर किसी के लिए मिसाल है।
5 सितंबर 1986.. वो दिन जब Pan AM 73 फ्लाइट को करांची एयरपोर्ट पर आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था। ये फ्लाइट मुंबई से अमेरिका जा रही थी। फ्लाइट में 380 यात्री और 13 क्रू मेंबर्स थे। नीरजा भनोट भी इसी फ्लाइट में अटेंडेंट थीं।
हाईजैक का पता चलते ही नीरजा ने कॉकपिट में बैठे पायलट्स को अलर्ट किया। उस दिन नीरजा ने अपनी सूझबूझ से कई यात्रियों की जान बचाई। काफी देर बाद परिस्थितियों का फायदा उठाकर नीरजा ने यात्रियों को प्लेन के इमरजेंसी एग्जिट से बाहर निकालना शुरू किया। अंत में जब नीरजा के फ्लाइट से उतरने का मौका आया, तब उन्हें प्लेन में तीन बच्चे फंसे दिखे। वह बिना डरे उन बच्चों को बचाने चली गईं। बच्चे तो बच गए, लेकिन नीरजा को आतंकियों ने मार डाला। तब नीरजा सिर्फ 22 साल की थीं।
नीरजा का जन्म हरीश और रमा भनोट के घर चंडीगढ़ में 7 सितंबर 1963 में हुआ था। अपने माता-पिता की लाडली थीं, इसलिए उन्हें घर पर लाडो के नाम से भी बुलाया जाता था। नीरजा की पढ़ाई पहले चंडीगढ़ और फिर मुंबई में हुई।
मुंबई में पढ़ाई के दौरान ही उन्हें मॉडलिंग के ऑफर मिलने लगे। नीरजा कई बड़ी कंपनियों के विज्ञापन में भी दिखीं।
19 साल की उम्र में नीरजा की शादी एक मरीन इंजीनियर कर दी गई। शादी के बाद वह शारजाह, यूएई शिफ्ट हो गईं। लेकिन वहां उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। तानों, धमकियों, भूख और मारपीट.. दो महीनों तक ये सब सहने के बाद नीरजा ने अपने पति को छोड़ दिया और वापस मुंबई आ गईं। इसके बाद उन्होंने फ्लाइट अटेंडेंट का करियर चुना।
नीरजा की मां रमा भनोट ने बताया है कि एक बार जब नीरजा ने उनसे पूछा कि मां अगर मैं कभी हाईजैक जैसी किसी परिस्थिति में फंस गई तो मुझे क्या करना चाहिए? तब उनकी मां ने कहा था- अगर ऐसा कुछ हुआ तो भाग जाना।
इस पर नीरजा ने काफी विश्वास के साथ अपनी मां से कहा था - 'तुम्हारे जैसी मां होंगी तो देश का क्या होगा? मर जाऊंगी लेकिन भागूंगी नहीं।' अपनी इस बात को नीरजा ने सच कर दिखाया। 5 सितंबर 1986 की उस बेहद मुश्किल और खौफनाक परिस्थिति में भी नीरजा बचकर नहीं भागीं। बल्कि दूसरों के लिए अपना जान कुर्बान कर दी।
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