'हालात बेहद कठिन थे। मैंने अब तक ऐसे दिन नहीं देखे थे। मेरे पास पहले रोजाना कम से कम चार ग्राहक आते थे। लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद कोई नहीं आता था। इससे हमारे लिए दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया था। कई रातें पानी पीकर गुजारनी पड़ी थीं।' बात करते-करते शबनम (बदला हुआ नाम) का गला भरा आया। वह आगे बताती हैं, 'अकेले हमारी नहीं, यहां रहने वाली करीब तीन हजार महिलाओं की यही कहानी थी।'
अनकही कहानियां : लॉकडाउन ने जीबी रोड की घुटती जिंदगी को किया अनलॉक, दिखी नई राह
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शबनम आगे कुछ कहती, उससे पहले बगल में बैठी रेशमा (बदला हुआ नाम) बोल पड़ी, 'यह क्या बताएगी, मुझे तो एक बार दो दिन तक खाना नहीं मिला था। वो तो भला हो, पुलिस वाली दीदी (एसआई किरण सेठी ) का, जो मददगार बनकर आगे आई। 'लॉकडाउन' ने हमारी जिंदगी को ऐसा अनलॉक किया कि 'दो गज' छोड़िए, आज बदनाम गली से 'हजारों गज' दूर जा चुकी हूं। कोविड प्रोटोकाल के लहजे में बात खतम करते-करते वह खिलखिला पड़ी।
शबनम और रेशमा कभी दिल्ली की रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर थीं। आज दोनों नौकरी कर रही हैं। यह संभव हुआ, पिछले साल लगे लॉकडाउन से। इसके बाद इनका पेशा पूरी तरह ठप हो गया। इससे जीबी रोड की करीब तीन हजार महिलाओं की रोजी-रोटी पर संकट आन खड़ा हुआ था। बचत आदि न होने से कईयों को भूखों रहना पड़ा था। इसकी सूचना जीबी रोड चौकी प्रभारी किरण सेठी को मिली। सेक्स वर्कर्स में दीदी के नाम से मशहूर सेठी ने कुछ निजी तो कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से सबसे पहले खाने का इंतजाम करवाया।
किरण सेठी के मुताबिक, हमें लगा कि लॉकडाउन इनकी जिंदगी को दूसरी दिशा में मोड़ने का अवसर हो सकता है। एक बार जब सबके भोजन का इंतजाम हो गया तो अलग-अलग तरीके से इनको हुनरमंद बनाया गया। इसका सबका नतीजा यह रहा कि आज दो महिलाएं नौकरी कर रही हैं। जबकि करीब बीस रेड लाइट एरिया छोड़कर जाने को तैयार हैं।
लॉकडाउन की वजह से...
भोजन का इंतजाम होने के बाद इनकी उदासी दूर करने के लिए काउंसलिंग करवाई गई। इसी बीच इन महिलाओं के लिए नियमित योग की क्लास शुरू हुई। सबका हेल्थ चेकअप करवाया गया। इसी दौरान छोटे-छोटे कामधंधे करने लायक प्रशिक्षण दिलवाया गया। अब प्रोफेशनल व वोकेशनल कोर्स कराने की भी तैयारी है। किरण सेठी बताती हैं कि अभी इनमें अपनी कमाई को लेकर बड़ी अनिश्चितता है। उम्मीदन जब आमदनी का दूसरा स्रोत मिलेगा तो कई महिलाएं दमघोंटू पेशे को खुद ही छोड़ देंगी।