नोएडा के सेक्टर-66 मामूरा में बुधवार को जिस पांच मंजिला इमारत में भीषण आग लगी, वह पांच फीट से भी कम चौड़ी गली में बनी है। यहां अवैध निर्माण कर ऐसी अनगिनत इमारतें खड़ी कर दी गई हैं। अकेले मामूरा ही नहीं नोएडा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी 81 गांवों में अवैध निर्माण धड़ल्ले से जारी है।
इसे रोकने और भवन नियमावली को प्रभावी ढंग से लागू कर सुनियोजित विकास सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी नोएडा प्राधिकरण की है, लेकिन प्राधिकरण इसमें नाकाम साबित हो रहा है। नतीजतन, गांवों में बिना किसी सुरक्षा मानक के धड़ल्ले से पीजी, बाजार और फ्लैट्स बनाए जा रहे हैं।
आबादी और रोजगार के बढ़ते दबाव के कारण मकान मालिकों को इनसे मोटा किराया तो मिल जाता है लेकिन इन इमारतों में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं होते। वहीं, पूरे मामले पर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी अपना पल्ला झाड़ते हुए बस यही कहते हैं कि गांवों में इमारत बनाने से पहले कोई नक्शा पास कराने ही नहीं आता।
2 of 12
नोएडा के पीजी में लगी आग में जले वाहन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
प्राधिकरण गांवों की जमीन को चिह्नित कर उसे स्थानीय निवासियों की आवासीय जरूरतों के लिए छोड़ता है। इन गांवों के आसपास विकसित सेक्टर हैं, जहां प्लॉट आवंटन के बाद सख्त नियमों और नक्शा पास कराकर ही निर्माण की अनुमति होती है। शहर के औद्योगिक विकास के साथ ही यहां रहने वाले कामकाजी लोगों की मांग तेजी से बढ़ी है।
3 of 12
नोएडा के पीजी में लगी आग में जले वाहन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सेक्टरों और सोसायटियों में किराया व संपत्तियों की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में गांवों के जमीन मालिक बहुमंजिला इमारतें बनाकर उन्हें किराये पर उठा रहे हैं। इस खेल में बिल्डर भी सक्रिय हो गए हैं, जो अवैध अपार्टमेंट बनाकर धड़ल्ले से फ्लैट बेच रहे हैं।
4 of 12
नोएडा के पीजी में लगी आग में जले वाहन
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
मोटी कमाई के लालच में गांवों की आबादी वाली जमीन पर बिना किसी नियम के पीजी, गेस्ट हाउस और होटलों का जाल बिछ गया है, जिनका एकमात्र लक्ष्य सिर्फ मुनाफा कमाना है।
5 of 12
नोएडा के पीजी में लगी आग, मौके पर जमा भीड़
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
गांवों के लिए 2010 में बनी थी भवन नियमावली, पर एक भी नक्शा पास नहीं हुआ
प्राधिकरण ने अपने क्षेत्र के गांवों के लिए साल 2010 में एक ''भवन नियमावली'' तैयार की थी। इसके तहत गांवों में केवल तीन मंजिल तक निर्माण की मंजूरी थी और सेटबैक (इमारत के चारों तरफ खाली जगह) समेत अन्य नियमों का पालन करना अनिवार्य था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज तक किसी भी गांव से एक भी नक्शा पास नहीं कराया गया।