लद्दाख में शहीद हुए उत्तराखंड के के लाल देव बहादुर का ग्राम गोरीकलां के निकट शमशान घाट पर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि शहीद के पिता शेर बहादुर ने दी। रक्षा बंधन से पहले भाई को खोने का गम बहन के चेहरे पर भी साफ झलक रहा था।
तिरंगे में लिपटे भाई के शव को देख बहन बिलख पड़ी। परिवार वालों का रो रोकर बुरा हाल है। परिजनों को रोता-बिलखता देख मौके पर जमा लोगों की आंखें भी नम हो गईं। बहन बार-बार चिल्ला चिल्ला कर कह रही थी कि भइया तुम खुद चल कर क्यों नही आ रहे हो। बहन गीता ने बड़े अरमानों से भाई की कलाई के लिए राखी खरीदी थी। लेकिन उसे क्या पता था कि रक्षाबंधन आने से पहले ही उसका प्यारा भाई देश के लिए बलिदान हो जाएगा। भाई की पार्थिव देह ताबूत में देखकर सुधबुध खो बैठी गीता ने होश आने पर राखी को ताबूत पर बांध दिया।
शहीद का शव लालपुर पहुंचने की सूचना घर वालों को मिली तो देव बहादुर के दोनों भाई किशन व अनुज भी वहां पहुंच गए। एंबुलेंस में भाई का शव देखकर छोटा भाई अनुज होश खो बैठा। बेसुध होकर गिरने से पहले ही दोस्तों और विधायक शुक्ला ने उसे संभाल लिया। विधायक और दोस्तों ने समझा कर उसे हिम्मत दी।
शहीद देव बहादुर का शव तीन दिन बाद पहले एंबुलेंस और फिर सैन्य वाहन से उनके गांव पहुंचा। स्थानीय लोगों और नौजवान जुलूस की शक्ल में सैन्य वाहन को गांव तक ले गए। रास्ते में सड़क किनारे और घरों की छतों में खड़े होकर लोगों ने शहीद को नमन किया।
बुधवार सुबह करीब साढ़े सात बजे कुछ लोग सड़क पर टहल रहे थे। इसी बीच लालपुर नगला मार्ग पर एक एंबुलेंस आकर रुकी। पहले तो लोगों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन थोड़ी देर बाद कुछ युवक एंबुलेंस के पास गए तो चालक ने वाहन में शहीद देव बहादुर का पार्थिव शरीर होने की जानकारी दी। यह जानकारी मिलते ही लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।