तहसील में पुस्तकालय... चौंकिए नहीं ये सच है। पूर्णागिरि (टनकपुर) तहसील में पिछले साल नवंबर में नागरिक पुस्तकालय अस्तित्व में आया है। देर रात तक खुले रहने वाले इस पुस्तकालय में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वालों को कामयाबी की बारीकियां भी बताई जा रही हैं। ये अभिनव पहल की है उत्तराखंड प्रांतीय लोक सेवा आयोग के 2016 बैच के टॉपर और टनकपुर के एसडीएम हिमांशु कफल्टिया ने।
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एसडीएम हिमांशु कफल्टिया के पुस्तकालय में पढ़ते बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना काल के बीच उन्होंने तहसील के एक कमरे में पुस्तकालय खोलकर प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए स्तरीय किताबों की कमी को दूर करने का प्रयास किया है। इसकी शुरुआत एसडीएम ने अपने खर्च पर दिल्ली से 1.13 लाख रुपये की पुस्तकें मंगवा कर की। बाद में उन्होंने इसे लेकर व्यापार मंडल और स्थानीय लोगों को प्रेरित करने के साथ ‘इच फैमिली टू बुक’ की थीम पर लोगों से भी सहयोग लिया। पुस्तकालय में फर्नीचर की व्यवस्था के लिए एक एनजीओ से मदद ली गई। एनसीईआरटी के अलावा सामान्य अध्ययन, विषयगत के अलावा प्रेरणा देने वाली पुस्तकें हैं।
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किताबें
- फोटो : अमर उजाला
पुस्तकालय में वर्तमान में करीब 500 किताबें हैं और 30 छात्र-छात्राएं पढ़ने आ रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे पूजा पांडेय, मोहित देउपा सहित तमाम अभ्यर्थी कहते हैं कि लाइब्रेरी से उन्हें तैयारी में मदद मिल रही और सहयोग और सामूहिकता की सीख भी मिल रही है। खुद डीएम एसएन पांडेय भी एसडीएम की इस नेक पहल को युवाओं को प्रेरित करने वाला बताते हुए सराह चुके हैं।
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एसडीएम हिमांशु कफल्टिया के पुस्तकालय में पढ़ते बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
नैनीताल जिले के पिछड़े ओखलकांड ब्लॉक से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु कफल्टिया बताते हैं कि तैयारी के दौरान उच्च स्तरीय किताबों की कमी को देखकर पुस्तकालय का विचार आया था। अच्छी पुस्तकों की कमी के अलावा मार्गदर्शन की चुनौती कई बार आई। ऐसी दिक्कतें कमजोर आर्थिक वर्ग के प्रतिभावान युवाओं को न आएं, इसके लिए उन्होंने इस पुस्तकालय की पहल की है।
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लाइब्रेरी में पढ़ते बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
कहते हैं कि प्रतियोगी परीक्षा के लिए अभ्यर्थियों को पुस्तकों से लेकर कोचिंग के लिए दिल्ली, देहरादून, इलाहाबाद, कोटा आदि जाना अक्सर मजबूरी होता है। इन स्थानों पर प्रतियोगी माहौल के अलावा गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री मिलती है, लेकिन इसके लिए उनके पास वित्तीय संसाधन होने चाहिए। फिर अभ्यर्थियों की 50 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा पढ़ाई के बजाय कमरे, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं में बर्बाद हो जाती है।