उत्तराखंड के चमोली में ऋषि गंगा के सैलाब में कई जिंदगियों को बचाने वाले महेंद्र रावत खुद सैलाब में खो गए, जिसका आजतक कोई पता नहीं चल पाया है। महेंद्र के मासूम बच्चे, पत्नी और माता-पिता उसके लौटने का इंतजार कर रहे हैं।
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आपदा में लापता महेंद्र
- फोटो : अमर उजाला
महेंद्र तपोवन परियोजना में सेफ्टी (सुरक्षा कर्मी) के पद पर कार्यरत थे। सात फरवरी को धौली गंगा में जल प्रलय आते देख महेंद्र बैराज की और दौड़े और वहां काम कर रहे लोगों को सुरक्षित जगहों पर चले जाने के लिए कहा। इसी बीच अचानक बैराज में भारी मलबा आ गया और महेंद्र उसी में कहीं खो गए। महेंद्र का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है।
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चमोली में आपदाग्रस्त क्षेत्र
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जोशीमठ के चौरमी गांव निवासी महेंद्र के माता-पिता, पत्नी और दो मासूम बच्चे आपदा के 15 दिन बाद भी उसके आने की राह देख रहे हैं। महेंद्र से साथ परियोजना में कार्यरत संदीप ने बताया कि आपदा वाले दिन महेंद्र बैराज साइट पर कार्य कर रहे थे। जैसे ही ऋषि गंगा का सैलाब परियोजना की ओर बढ़ने लगा, तो महेंद्र अपनी जिंदगी की परवाह किए बगैर बैराज साइट की ओर दौड़ पड़े।
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चमोली में आपदा के बाद बनी दलदल
- फोटो : अमर उजाला
यहां कार्य कर रहे मजदूरों को सुरक्षित स्थानों पर चले जाने के लिए कहने लगे, लेकिन कुछ ही देर में बैराज मलबे में तब्दील हो गया और महेंद्र सैलाब में कहीं खो गए। अभी तक भी महेंद्र का कोई सुराग नहीं लग पाया है। महेंद्र के अभी तक कुछ पता नहीं चलने से पत्नी और माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है।
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चमोली में आपदा के बाद का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
बता दें कि ऋषि गंगा की आपदा के बाद से तपोवन सुरंग और बैराज साइट से मलबा हटाने का कार्य जारी है। आपदा के बाद से अब तक 68 शव और 28 मानव अंग बरामद कर लिए गए हैं। आपदा में 136 लोग अभी भी लापता हैं।