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शरद पूर्णिमा 2018: व्रत के बाद करें चंद्र दर्शन, ये 2 काम करने से घर में भर जाएगा धन का भंडार

Wed, 24 Oct 2018 08:29 AM IST
कौशल सिखौला/अमर उजाला, हरिद्वार
कौशल सिखौला/अमर उजाला, हरिद्वार Updated Wed, 24 Oct 2018 08:29 AM IST
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Sharad purnima 2018 Solution for Good Luck and Money
moon - फोटो : moon

शरद पूर्णिमा की रात में आज भी ब्रह्मांड में कहीं राधा-कृष्ण का महारास होता है। 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा की रोशनी होते ही 64 कलाओं के अवतार भगवान कृष्णा राधा के साथ महारास रचाते हैं। द्वापर में बृज में भी इसी दिन गोपियों के साथ कृष्ण ने महारास किया था। ब्रह्मा के दरबार में शरद पूर्णिमा की रात्रि में महारास करते हुए राधा-कृष्ण जलरूप हो गए और वही जल गंगा बनी। शरद पूर्णिमा का पर्व अश्विन शुक्ल कृष्ण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। मान्यता है कि 16 कलाओं से युक्त पूर्ण चंद्र से इस रात्रि सोम वृष्टि होती है।

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शरद पूर्णिमा विशेष

शरद पूर्णिमा वास्तव में शरद का समापन और हेमंत ऋतु का आगमन पर्व भी है। जन्म कुंडली में चंद्रमा क्षीण हों, महादशा-अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा चल रही हो या चंद्रमा छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो तो चन्द्र कि पूजा और मोती अथवा स्फटिक माला से ॐ सों सोमाय मंत्र का जाप करें। इससे आपको धनलाभ होगा। इस रात्रि में खीर अथवा चिवड़े के सेवन से जीवनदायनी ऊर्जा प्राप्त होती है। इन दोनों पदार्थों कोई भी दूध के साथ तैयार कर चंद्रमा के रौशनी में रखने चाहिए। जब एक प्रहर अथवा तीन घंटे बीत जाएं, तब वह खीर मानस रूप से महालक्ष्मी को अर्पित की जाती है। बाद में समूचे परिवार के साथ चंदनी में बैठकर इसे ग्रहण करते हैं। हिन्दू धर्म में शरद पूर्णिमा के व्रत को कौमुदी व्रत कहा गया है। 

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moon - फोटो : moon

वेदों में अमृत को सोम कहा गया है। इन दिनों भगवान विष्णु तो राजा बलि के दरबार में पाताल में हैं, लेकिन महालक्ष्मी क्षीरसागर से निकलकर चंदा की चांदनी में रात के समय निकलती हैं। पौराणिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु शरद पूर्णिमा का व्रत रखकर रात्रि में दूध मिश्रित चावल या चीवड़ा ग्रहण करता है, उसे लक्ष्मी धन बांटती हैं। इसी रात्रि में महाबलि रावण पूरी रात्रि चंद्रमा के प्रकाश को अपनी नाभि में ग्रहण करता था। ऐसा करने से ही उसकी नाभि में अमृत घट भर गया था। 

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शरद पूर्णिमा विशेष

चंद्रमा से बरसने वाला अमृत वर्ष में सबसे अधिक इसी दिन प्राप्त होता है। केवल यहीं दिन है, जब चंद्रमा का आकार सबसे बड़ा होता है और संपूर्ण 16 कलाओं से युक्त होता है। मान्यता है कि इसी दिन से पाताल गए विष्णु के आगमन की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। राधा-कृष्ण के महारास की रात्रि अनादि राधा-कृष्ण से जुड़ी हुई है। शास्त्रों अनुसार सृष्टि निर्माण होने पर ब्रह्मा के कहने पर कृष्ण ने राधा के साथ ब्रह्मलोक में महारास रचाया। 

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शरद पूर्णिमा विशेष

ब्रह्मा के उद्देश्य था कि इस रास से धरती पर रस बरसेगा और जीवन उदय होगा। राधा-कृष्ण रास में इतने लीन हो गए कि एक दूसरे में खोकर वे जलरूपी द्रव बन गए। यही द्रव राधा-कृष्ण की महारास से वापसी पर गंगा बन गई। यहीं गंगा भगीरथ की प्रार्थना पर बाद में शिव की जटाओं से होती हुई धरती पर आई। यह दिन और यह रात महारात्र भी कहे जाते हैं। महारास के इस महारात्र में आनंद वृष्टि सर्वत्र होती है।  

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