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SC/ST एक्ट भारत बंद में जंग के मैदान में बदल गया रुड़की, खाक में मिली तीन बसें तो दो को लगी गोली
अंकित कुमार गर्ग, अमर उजाला, रुड़की
Updated Tue, 03 Apr 2018 04:38 PM IST
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bharat bandh in roorkee
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सुप्रीम कोर्ट की ओर से एससी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर की गई टिप्पणी से गुस्साया दलित समाज लाठी डंडे लेकर सड़कों पर उतर आया। बिन बुलाये ही शहर में युवाओं का सैलाब उमड़ आया। उसमें भी 90 प्रतिशत 20 से 25 बरस के युवा।
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वहीं प्रदर्शनकारियों ने उत्तराखंड रोडवेज की तीन बसों को आग के हवाले कर दिया। इसके अलावा नौ बसों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। इसके बाद रोडवेज प्रबंधन ने यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनजर दिल्ली रूट पर बस सेवा बंद कर दी है। इससे यात्री किराए के रूप में मिलने वाले करीब 25 लाख के राजस्व का नुकसान हुआ है। देखते ही देखते रुड़की देहात क्षेत्रों के दलित युवाओं का अखाड़ा बन गया। हाथों में डंडे और तिरंगा और नीले झंडे लिए युवा जय भीम के नारों के साथ सड़कों पर दौड़ रहे थे। रुड़कीवासियों ने इतना बड़ा जमावड़ा न किसी रैली में देखा था और न किसी आंदोलन में। खास बात यह थी कि इन युवाओं में कोई नेता नहीं था बल्कि सभी अपने आप में नेता था। रुड़की और हरिद्वार में दलितों के प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। यहां गोली लगने से दो लोग घायल हो गए हैं। फायरिंग में 16 वर्षीय किशोर शिवानंद निवासी मोहम्मदपुर कलियर और कय्यूम निवासी बेलड़ा को गोली लगी है।
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युवा ही एक दूसरे का नेतृत्व करते नजर आ रहे थे। जिसके कारण पुलिस प्रशासन की भी यह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वे किससे बात करें। एसएसपी कृष्ण कुमार ने भी माना कि इन युवाओं में नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। शायद यही कारण था कि पुलिस हाईवे और सड़कों पर बवालियों को हटाने में शाम के छह बज गए। शायद पुलिस प्रशासन को भी इसका अंदाजा नहीं था कि दलित समाज की ओर से भारत बंद का आह्वान उनके लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है। क्योंकि इससे पहले भी दलित आंदोलनों में इतनी बड़ी आंच नहीं आई। इसकी मुख्य वजह रही इस आंदोलन में शामिल होने वाले 20 से 25 बरस के युवा। जिन्हें शायद यह भी नहीं पता कि उन्हें क्या करना है।
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यही कारण था कि दोपहर एक बजे तक युवाओं की ओर से प्रदर्शन तो किया गया लेकिन न तो तोड़फोड़ शुरू की गई और न ही पुलिस से कहीं टकराव हुआ। इसके चलते पुलिस प्रशासन भी राहत महसूस करता था। लेकिन गणेशपुर चौक पर जब ऐसे ही युवाओं का कुछ लोगों से टकराव हो गया तो अचानक नजारा बदल गया। युवाओं का यह हुजूम जब गोलीबारी और पत्थरबाजी के बाद उग्र प्रदर्शन करते हुए हाईवे पर गणेशपुर पुल पर पहुंचा तो यहां भी एसएसपी और डीएम काफी देर तक इन युवाओं से उलझते रहे। पुलिस प्रशासन भी इससे परेशान रहे कि इतनी भीड़ में उन्हें कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति या नेता बातचीत करने के लिए नहीं मिला।
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रुड़की में दलित समाज के लोगों के सड़कों पर उतरते ही दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। शहर में अघोषित रूप से कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो गए। आलम यह रहा कि लोग खाने-पीने की चीजों से लेकर दवा तक के लिए भटकते रहे। बाजार बंद कराते समय कुछ दुकानदारों की दलित समाज के लोगों से तीखी नोकझोंक भी हुई। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सोमवार की सुबह नौ बजे ही दलित समाज के लोगों ने शहर की ओर कूच करना शुरू कर दिया। मंगलौर की ओर से जनसमुह के आने की भनक लगते ही अधिकतर दुकानदारों ने दुकानों को बंद कर दिया, लेकिन कुछ दुकानदारों ने दुकानें खुली रखीं। जिस पर लाठी-डंडों के साथ पहुंचे लोगों ने चेतावनी देते हुए दुकानों को बलपूर्वक बंद कराया।