दस मुहर्रम (यौमे आशूरा) पर हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत पर शहर में निकाले गए मातमी जुलूस में ‘या हुसैन’ की सदाएं गूंजती रहीं। अलम और ताजिया के जुलूस में बच्चों से लेकर बड़ों ने हुसैन के गम में खुद को छुरियों और जंजीरों से लहूलुहान कर लिया। जुलूस के दौरान हुसैन की जिंदगी से सबक लेकर आतंकवाद और जालिम ताकतोें का डटकर सामना करने का संकल्प लिया गया।
मुहर्रम पर गूंजती रही या हुसैन की सदाएं, बहते रहे आंसू और लहू, तस्वीरें...
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रविवार को ईसी रोड स्थित इमामबाड़े में बड़ी तादाद में शिया समुदाय के लोग इकट्ठा हुए। दोपहर करीब सवा दो बजे अंजुमन मोइनुल मोमिनीन के बैनर तले जुलूस की शुरुआत हुई। जुलूस के आगे लोग नोहाख्वानी कर रहे थे। इमाम हुसैन का घोड़ा, जुनजुना और ताजिए लेकर मातमी चल रहे थे। इनके पीछे लोग छुरियों और जंजीरों से मातम कर रहे थे।
शोगवार या हुसैन कहते और अपनी पीठ और छाती को लहूलुहान कर लेते। बच्चों ने भी खुद को लहूलुहान कर लिया। मातमी जुलूस सर्वे चौक, कनक चौक, लैंसडॉन चौक, दर्शनलाल चौक से होकर इनामुल्ला बिल्डिंग पर आकर थम गया। यहां मौलाना असगर और मौलाना शबी हैदर ने इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को बयां किया।
उन्होंने कहा कि हुसैन ने दुनिया में बराबरी और अमन का संदेश दिया। इंसान की इज्जत और शान को आगे रखा। हक और इंसाफ के लिए वह अत्याचारी ताकतों से लड़ते रहे। उन्होंने लानत की जिंदगी से बेहतर इज्जत और इकबाल वाली शहादत को स्वीकार किया। उनकी शहादत को हमेशा हमेशा याद रखा जाएगा। यजीद की जालिम सेना के अत्याचार के वाक्यात सुनकर शोगवार रोने लगे।
इनामुल्ला इमारत में कर्बला में ताजिया दफन किए गए। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद रही। इस मौके पर बुजुर्ग शमीम जैदी, मौलाना शाहरजा, एएच नकवी, अफसर हुसैन, सद्देम जैदी, हसन जैदी, एसएमए हसनैन, मौलाना मौहम्मद असगर, हसन जैदी, मंजूर जान हुसैन, जावेद हुसैन जान, समल नकवी, राजा जैदी, हैदर अब्बास जैदी, सिकंदर जैदी आदि तमाम लोग मौजूद थे।