कितना भी लिखो इसके लिये कम है। सच है ये कि 'माँ' तू है, तो हम हैं। वैसे तो मां के लिए कितने भी शब्द लिख लो कम ही होंगे। लेकिन मां ही वो ममता की मूरत है जो हमें जीवन का परिचय देती है।
ये तस्वीरें है देहरादून के एक कंस्ट्रक्शन साइट की। अपने बच्चे को बेहतर भविष्य देने के लिए एक मां कितनी कठिनाइयों को झेलती है यह साफ नजर आ आता है। लेकिन इसके बाद भी वह खुश है।
कहा जाता है कि बच्चा जब बड़ा होने लगता है तो वह सबसे पहले मां शब्द ही बोलता है। महापुरुषों के जीवन में उनकी मां ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वीर शिवाजी को सशक्त योद्धा बनाने में उनकी माता का योगदान रहा है। मां के प्रति अनन्य श्रद्धा ही व्यक्ति को बड़ा बनाती है।
कहा जाता है कि कुँवारी मैरी (ईशु की माँ) को सम्मान देने के लिये चौथे रविवार को ईसाईयों के द्वारा भी मातृ दिवस को मनाया जाता है। 1600 इंसवी के लगभग इंग्लैण्ड में मातृ दिवस मनाने उत्सव का एक अलग इतिहास है। ईसाई कुँवारी मैरी की पूजा करते हैं, उन्हें कुछ फूल और उपहार चढ़ाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
वर्ष 1972 में जूलिया वार्ड हौवे (एक कवि, कार्यकर्ता और लेखक) के विचारों के द्वारा आधिकारिक कार्यक्रम के रुप में यूएस में मातृ दिवस को मनाने का फैसला किया गया था। जून के दूसरे रविवार को मातृ शांति दिवस और 2 जून को मनाने के लिये एक शांति कार्यक्रम के रुप में उन्होंने मातृ दिवस की सलाह दी थी।