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एकमात्र मंदिर जहां नवरात्र में देवी की प्रतिमा नहीं, शिव लिंग की होती है पूजा, जानिए महत्व

Mon, 25 Sep 2017 08:33 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पौड़ी
ब्यूरो/अमर उजाला, पौड़ी Updated Mon, 25 Sep 2017 08:33 AM IST
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navratra special devi temple where devotee worship shiva linga during navratra
temple is in pauri garhwal

उत्तराखंड में आद्य शक्ति मां भुवनेश्वरी का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवी प्रतिमा के स्थान पर लिंग पूजा होती है। इस लिंग को श्रृंग भी कहते हैं। लोक मान्यता है कि यह श्रृंद अनादि काल से यहां स्थित है। यह श्रृंग सृष्टि के अंत में भी अपने स्थान पर रहेगा। भुवनेश्वरी मंदिर में पूजा की प्राचीन परंपराएं आज भी चली आ रही हैं। मां भुवनेश्वरी देवी के मंदिर में श्रद्धापूर्वक पुष्प चढ़ाने और पूजा अर्चना के बाद धर्म, अर्थ, काम और अंत में मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।  

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गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी से करीब 20 किमी दूर कोट ब्लाक के भवन गांव के समीप चंद्रकूट पर्वत के शीर्ष पर विराजमान अष्ठ खंब के बीच में मंदिर के गर्भ गृह में प्रकाशमान लिंग स्थापित है। पुजारी पंकज जुयाल बताते हैं कि इस लिंग को साक्षात देवी के तीन रूपों में मान्यता है।

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bhuvneshwari devi

भुवनेश्वरी मंदिर समिति के सचिव नवीन जुयाल बताते हैं कि भगवती भुवनेश्वरी ही आद्य शक्ति है। वह अखिल ब्रह्मांड की स्वामी है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन्हीं के चरणों की वंदना करते हैं। यही वजह है कि कोट के भुवनेश्वरी मंदिर में सुबह ब्रह्ममुहुर्त में माता को जगाने के लिए धूंयैल बजाई जाती है। तीन जोड़ी ढोल दमाऊ की घमक (धूंयैल) दूर गांवों तक पहुंचकर लोगों को जगाती है।

 

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maa bhuvneshwari temple

ग्रामीण सुबह उठते ही भुवनेश्वरी का स्मरण कर दिन का शुभारंभ करते हैं। रात्रि में बाजगीर धूयैल देकर आरती के साथ ही माता को विश्राम तक पहुंचाते हैं। आध्यात्म के साथ ही भुवनेश्वरी मंदिर और आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक नजारों से भी भरपूर है। यही वजह भी है कि नवरात्रों में यहां हजारों की संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। 

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maa bhuvneshwari temple

ऐसे पहुंचे-
यहां तक पहुंचने के लिए निजी या बुकिंग कर बस या टैक्सी से पहुंच सकते हैं।             
 पौड़ी से सड़क मार्ग की दूरी - 20 किमी                                
देवप्रयाग से सड़क मार्ग की भुवनेश्वरी - 40 किमी

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