उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में बंदरों से गांव के किसान ही नहीं अर्द्धसैनिक बलों के जवान भी परेशान हैं। तमाम उपाय करने के बाद भी बंदरों के आतंक से निजात नहीं मिलने पर अब आईटीबीपी के जवान भालू बनकर बंदरों को डरा रहे हैं।
आईटीबीपी की सातवीं वाहिनी मिर्थी में पिछले लंबे समय से बंदरों का आतंक बना है। पिछले कई दशकों से आईटीबीपी के मैस के आस-पास डेरा डालने वाले बंदर भगाने पर भी डरते नहीं हैं। ये बंदर भगाने पर जवानों को ही काटने के लिए आ जाते हैं।
मिर्थी आईटीबीपी परिसर में ही केंद्रीय विद्यालय भी है। बंदर इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी काटने के लिए झपटते हैं। बंदरों को भगाने के तमाम उपाय करने के बाद जब सफलता नहीं मिली तो अब आईटीबीपी ने बंदरों का भगाने का एक अनूठा प्रयोग किया है। आईटीबीपी के दो जवानों को भालू की पोशाक पहनाई गई है।
भालू की पोशाक और मुखौटा पहनकर जैसे ही ये जवान बंदरों की ओर जाते हैं बंदर भाग जाते हैं। पिछले चार दिनों से प्रतिदिन दो जवान आईटीबीपी परिसर में भालू का रूप बनाकर घूम रहे हैं। इस अभिनव प्रयोग की सफलता से आईटीबीपी के अधिकारियों और जवानों के साथ ही केंद्रीय स्कूल के बच्चों को भी राहत मिली है।
बंदर बड़ी समस्या बन चुके हैं। पूरे परिसर में बंदर घूमते रहते हैं। भगाने पर जवानों को ही काटने को दौड़ पड़ते हैं। केंद्रीय विद्यालय के बच्चों के लिए बंदर खतरा बने हैं। अन्य सभी उपाय विफल रहे। रामलीला में जामवंत के पात्र को पहनाई जाने वाली पोशाक में दो जवान तैनात किए गए हैं। यह प्रयोग काफी हद तक सफल हो रहा है।
- अनुप्रीत टी बोरकर सेनानी, आईटीबीपी मिर्थी डीडीहाट।